प्रभु प्यारे से जिसका सम्बन्ध है।
उसे हर दम आनन्द ही आनन्द है ।।
झूठी ममता का करके किनारा,
ले के सच्चे प्रभु का सहारा ।
जो उसकी रजा में रजामन्द है ।। १ ।।
जिसकी कथनी में कोयल – सी चहक है ।
जिसकी करनी में फूलों – सी महक है ।
प्रेम नरमी ही जिसकी सुगन्ध है ।।२ ।।
निन्दा चुगली ना जिसको सुहाए ।
बुरी संगत की रंगत ना भाए ।
सत संगत ही जिसको पसन्द है ।। ३ ।।

दीन दुःखियों के दुःख जो मिटाए ।
बन के सेवक भला सबका चाहे ।
नहीं जिसमें घमण्ड और पाखण्ड है ।। ४ ।।

