आर्य वीर दल ही क्यूँ ?

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जब इस देश में विभिन्न राजनैतिक संगठनों की युवा वर्ग में कार्य करने के
लिए पृथक् इकाइयाँ बनी हुई हैं। इस देश में रहने वाले अधिसंख्य लोग हिन्दू
हैं, जिनका हित चिन्तन करने के लिये अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं। उनका
अनुकरण करके अन्य धर्मों के मानने वाले भी अपनी रक्षार्थ सेना बनाने का
प्रयत्न कर रहे हैं, इतना ही नहीं प्रत्येक बिरादरी ने अपने हित रक्षणार्थ युवा
वर्ग को आकृष्ट किया है, प्रतिदिन नये संगठन बनते जा रहे हैं तो फिर आर्य
वीर दल की क्या आवश्यकता है? इस समय सभी हिन्दुओं को अपने मतभेद
भुलाकर एक सूत्र में बँध जाना चाहिये। अर्थात् अपनी ढपली बजाने की क्या
तुक है? इत्यादि अनेक प्रश्न आर्य वीर दल के कार्यकर्ताओं से पूछे जाते हैं।

किसी भी संगठन को परीक्षा की कसौटी पर कसने के लिये उसके
उद्देश्य एवं कार्य पद्धति का ज्ञान होना आवश्यक है यहाँ आर्यवीर दल के
उद्देश्य, आर्य वीर की प्रतिज्ञा एवं उद्घोष उदधृत करके उन पर विचार
किया जायेगा।

आर्यवीर दल का उद्देश्य

  1. सार्वभौम सुख एवं शान्ति के लक्ष्य को ध्यान में रख विश्व में वैदिक धर्म,
    वैदिक संस्कृति तथा वैदिक सभ्यता के आधार पर सर्व साधारण में एवं
    विशेषतया नवयुवकों में उचित उपायों द्वारा स्फूर्ति, चरित्र एवं नैतिकता

के भाव उत्पन्न कर कृण्वन्तो विश्वमार्यम् के उद्घोष की पूर्ति करना।

  1. नवयुवकों में शारीरिक उन्नति की योग्यता उत्पन्न करने के साथ साथ

आत्मरक्षा, मानसिक एवं सामाजिक विकास, प्रेम सेवा, त्याग तथा
पुरुषार्थ की प्रवृत्ति का पोषण करना। इन उद्देशों को प्रतीक रूप में
संस्कृति; शक्ति; सेवा; से सम्बोधित किया जा सकता है

आर्य वीर की प्रतिज्ञा

  1. मैं आर्य संस्कृति व सभ्यता में, जो वेद के आधार पर विश्व कल्याण
    का मूल है, आस्था रखता हूँ।
  2. व्यक्ति अथवा समष्टि का शारीरिक एवं शस्त्रास्त्र सम्बन्धी बल पराक्रम
    आवश्यकता और अवसर के अनुरूप साधुजनों के रक्षार्थ आततायी
    आदि दुर्जनों के विनाश एवं धर्म मर्यादा की स्थापना करने मे ही लगाना
    चाहियें, इस सर्व सम्मत क्षात्र धर्म के सिद्धान्त पर आचरण करता रहूँगा।
  1. शारीरिक; आत्मिक और सामाजिक उन्नति करने के लिये नियम पूर्वक

सतत् व्यायाम, प्राणायाम सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सन्ध्या करूँगा।

4.’पुमान् पुंमांस परिपातु विश्वतः’ अर्थात् सर्वदा और सर्वथा मानव कोमानव का परिपालन करना मेरा कर्तव्य है।

  1. अपने देश को सब प्रकार से समृद्ध, शक्तिशाली और सम्पन्न बनाना
    मेरा कर्तव्य है।

आर्य वीर दल का उद्घोष
इस दल का मूलमन्त्र होगा ‘अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्तु’ तथा ‘कृण्वन्तो
विश्वमार्यम्’ अर्थात् हमारे वीर श्रेष्ठ हों (सर्वत्र विजय प्राप्त करें ) और सारे
विश्व को आर्य बनावें । पूर्वोक्त उद्देश्य, प्रतिज्ञा और उद्घोष पर ध्यानपूर्वक
विचार करें तो इनमें आर्य समाज के छठे नियम – संसार का उपकार करना
इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक
उन्नति करना, इसकी झलक मिलती है। जिसका निष्कर्ष यह निकला कि
आर्य वीर दल और आर्य समाज के मूल भूत सिद्धान्तों मे कोई भेद नहीं है।
केवल कार्य शैली ही पृथक् है।

जहाँ तक धर्म का प्रश्न है, आर्यवीर दल सार्वभौम धर्म में विश्वास रखता
है। सार्वभौम धर्म उसे कहते हैं। जिसे समस्त संसार के लोग विविध
सम्प्रदायों के मतानुयायी भी बिना किसी संकोच के स्वीकार कर सकें। धर्म
उस शाश्वत सत्य का नाम है जो व्यक्ति का सर्वाङ्गीण विकास करके मानव
को मानव से जोड़े। धर्म के नाम पर परस्पर लड़ना धर्म कदापि नहीं कहा जा सकता । महाभारत में धर्म का लक्षण बहुत ही उत्तम रीति से किया है

धारणात् धर्म इत्याहु धर्मो धारयते प्रजा :।
यत् स्याद् धारण संयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ।।

अर्थात् वे गुण कर्म, जो प्रजा का धारण कर सकें, धर्म के अन्तर्गत आते
हैं। जैसे सत्य बोलना, चोरी न करना, किसी निरपराध प्राणी को पीड़ा न
देना, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना इत्यादि गुणों को धारण करने से कौन
इन्कार कर सकता है।

मनु महाराज ने मनुस्मति में धर्म के दश लक्षण बतलाये हैं-
धृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः ।
धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।

  1. धृति- सदा सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान में
    भी धर्म (कर्तव्य पालन) को न छोड़ना।
  2. क्षमा- निन्दा स्तुति, अपमान, हानि, करने पर भी अपराधी के प्रति
    दयालु रहना, क्रोध न करना और बदला लेने का विचार छोड़ देना।
  3. दम- मन को सदा धर्म में प्रवृत्त रखते हुये अधर्म में जाने वाले मन की
    वृत्ति को रोकना।
  4. अस्तेय- बिना आशा छल कपट विश्वासघात या अन्य व्यवहार से पर

पदार्थ के ग्रहण करने रूप चोरी का मन, वचन कर्म से परित्याग करना।

  1. शौच- राग, द्वेष, मोह, पक्षपात आदि के त्याग से आत्मा मन आदि

आभ्यन्तर तथा मिट्टी पानी से बाह्य शरीर को शुद्ध रखना।

  1. इन्द्रिय निग्रह- इन्द्रियों को अधर्माचरण सेरोक धर्म में ही प्रवृत्त रखना करना।

7.धी- बुद्धिनाशक तथा मादक मांस, शराब, दुष्टों का संग, आलस्य,
प्रमादादि दुर्व्यसनों को छोड़ बुद्धिवर्धक सात्विक पदार्थों का सेवन,
सत्पुरुषों का संग, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य और योगाभ्यास से बुद्धि को
बढ़ाना।


8विद्या- पृथिवी से लेकर परमात्मा पर्यन्त पदार्थो का ज्ञान करना और
उनसे यथावत् उपकार लेना।

  1. सत्य- जो पदार्थ जैसा है उसको वैसा ही समझना वैसा ही बोलना
    और वैसा ही करना अर्थात मन वचन कर्म काएक रूप होना।

१०. अक्रोध- कोधादि दोषों को छोड़कर शान्ति इत्यादि गुणों को धारण करना। यह पक्षपात रहित न्यायाचरण रूप धर्म कहलाता है। यदि पूर्वाग्रह को
छोड़ के इन दश लक्षणों पर विचार किया जायें तो संसार के किसी भी
सम्प्रदाय या मत को मानने वाले व्यक्ति को धर्म के इन दस लक्षणों को
अपनाने में कोई आपत्ति नहीं होगी। किसी पद्धति विशेष से पूजा करना,
चोटी जनेऊ, दाढ़ी केश कड़ा, पट्टी या चिह्न विशेष धारण करना, धर्म न
होकर बाह्य आचार मात्र है। हाँ इनसे यदि किसी अच्छे कार्यकरने की प्रेरणा
मिले तो अच्छी बात है।

धर्म कोरे विश्वास या अन्ध विश्वास पर आधारित
न होकर युक्ति तथा तर्क की कसौटी पर खरा उतरने पर ही स्वीकार करने
योग्य है। इस आधार पर यदि सभी धर्म ग्रन्थों का विश्लेषण किया जाये तो
वेद द्वारा प्रति पादित वैदिक धर्म ही इस कसौटीपर खरा उतरता है। वैदिक
धर्म ही सार्वभौम धर्म के पद पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है।

व्यक्ति ही राष्ट्र की इकाई है। व्यक्ति के निर्माण से ही राष्ट्र का निर्माण
और उत्थानसम्भव है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक सम्पत्ति उसके नागरिक
ही हैं। इसी लिये आर्यवीरदल के कार्यक्रमों में व्यक्ति के शारीरिक विकास
के लिये सात्विक और पौष्टिक आहार, नियमित दिनचर्या, व्यायाम, सादगी,
सदाचार, संयम, ब्रह्मचर्य इत्यादि का पालन करने पर विशेष ध्यान दिया
जाता है। यदि किसी आर्य वीर को अभक्ष्य या मादक पदार्थ सेवन करने की
आदत है तो उसे वह दुर्गुण छोड़ देने की निरन्तर प्रेरणा दी जाती है।

दुर्भाग्य से वर्तमान समय की दूषित राजनीति के प्रभाव से लोगों में यह
मान्यता घर कर गई है कि व्यक्ति के व्यक्तिगतजीवन और सामाजिक जीवन
में अन्तर होता है। परन्तु यह विचार उचित नहीं है। हमारा यह दृढ़ विश्वास
है कि व्यक्तिगत जीवन को पवित्र रखे बिना सामाजिक व्यवहार का
उत्तरदायित्व भली भांति सम्भाला नहीं जा सकता। जब हम स्वयं दुर्बलताओं
के शिकार है, तो समाज को स्वच्छ वातावरण कैसे दे सकते हैं। अच्छाई का
प्रारम्भ पहले अपने घर से ही होता है। इसी लिये आर्य समाज के मुख्य
उद्देश्य में सर्वप्रथम शारीरिक और आत्मिक उन्नति करलेने के पश्चात् ही
सामाजिक उन्नति करने का विधान युग द्रष्टा महर्षि स्वामी दयानन्द जी ने
किया है।

संस्कृति राष्ट्र का प्राण है। जैसे मानव शरीर में जब तक प्राणों का
आवागमन होता है तब तक वह जीवित है। इसी भांति संस्कृति राष्ट्र को
एकता के सूत्र में बान्धे रखती है। हमारी संस्कृति आर्य संस्कृति है। इसे
वैदिक संस्कृति भी कहते हैं।

तदनुसार हमारे देश का नाम आर्यावर्त है। आर्यों ने इसे आबाद किया।
इनसे पहले यहाँ कोई नहीं रहता था। चार वेद, चार उपवेद, छ: दर्शन,
ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद्, वेदों के अनुसार स्मृति, धर्मग्रन्थ गीता, रामायण,
महाभारत इत्यादि आर्य संस्कृति के ज्ञान स्रोत हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम,
योगिराज श्रीकृष्ण, दर्शनों के प्रवक्ता आचार्य गौतम, कपिल, कणाद, जैमिनी
और महर्षि व्यास एवं अन्य धर्म ग्रन्थों के प्रणेता ऋषि मुनि और चक्रवर्ती
सम्राट् आर्य संस्कृति के उज्जवल रत्न हैं जो युगों-युगों से आर्य संस्कृति का
दिव्य सन्देश संसार को दे रहे हैं। आर्य वीर दल इन्हें ही अपना आदर्श एवं
मार्गदर्शक मानकर कार्य कर रहा है। वैदिक धर्म संस्कृति और आर्य सभ्यता
की रक्षा प्रचार तथा प्रसार इसका सर्वप्रथम लक्ष्य है।

इसके विपरीत कुछ संगठन वेद गिरि श्रृंग से प्रवाहित आर्य संस्कृति की
पावन गंगा को त्याग कर आततायी विदेशी आक्रमणों द्वारा दिये हुए हिन्दू
नाम से चिपक कर बैठे हैं। और आर्य संस्कृति के स्थान पर हिन्दू संस्कृति
का ही बेसुरा राग अलाप रहे हैं। जबकि यह सत्य है कि वर्तमान समय में
हिन्दू नाम से सम्बोधित किये जाने वाले सभी आर्य है, उनकी संस्कृति भी
आर्य संस्कृति है।

कोई भी संस्कृति उन्मुक्त वातावरण, विचार स्वातंत्र्य तथा निश्चिन्त
जीवन यापन होने पर ही पनपती है। पराधीन लोगों की कोई संस्कृति नहीं
होती है। महाभारत के युद्ध के पश्चात् वेदज्ञ विद्वानों का अभाव हो गया और
धर्म के नाम पर मिथ्या कर्मकाण्ड बहुदेवत्व, मूर्ति पूजा, जन्म से जाति-पाति,
पुराणादि जाल ग्रन्थ, तथा विभिन्न सम्प्रदायों का प्रार्दुभाव हुआ जिन्होंने आर्य
संस्कृति की पावन गंगा को उसी भाँति प्रदूषित कर दिया जैसे कि वर्तमान
समय मे गंगा नदी गंगा सागर में गिरने से पहले सभी प्रदूषणों से युक्त होती
है। कहाँ गंगोत्री की पावन गंगा आर्य संस्कृति और कहाँ कलकत्ते के पास
बहने वाली हुगली की गंगा तथाकथित हिन्दू संस्कृति, दोनों में आकाश
पाताल का अन्तर है।

हमारे मान्य धर्म ग्रन्थों में कहीं पर भी हिन्दू नाम नहीं आया। यहाँ तक
कि तुलसीदास जी ने इसकी चर्चा नहीं की। वस्तुतः यह नाम अरबी, फारसी
भाषाओं का है जिसका अर्थ उनके शब्द कोषों में चोर, डाकू, गुलाम, काफिर,
अधार्मिक, काला, अशुभ इत्यादि किया है। वे हमें इसी नाम से सम्बोधित
करते हैं। लोक में देखा जाता है कि किसी का नाम बिगाड़ कर बोलने से
कुछ दिन तो वह विरोध करता है, परन्तु कालान्तर में उसे अपने अपभ्रंश नाम
से चिढ़ या ग्लानि नहीं रहती और वह इसी बिगाड़े हुये नाम से बुलाने पर
भी व्यवहार में प्रवृत्त होने लगता है।

इसी भाँति विदेशियों द्वारा सम्बोधित
हिन्दू नाम को ही हम अपना वास्तविक नाम समझ बैठे। जब नाम ही हिन्दू
नहीं तो हिन्दू संस्कृति का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता। स्वयं सन्१६२६ई०
में काशी के ४६ पण्डितों ने मिलकर व्यवस्था पत्र लिखा कि हमारा नाम हिन्दू
नहीं है। इस पर स्वामी विशुद्धानन्द एवं बालशास्त्री के हस्ताक्षर भी थे। ये
दोनों अपने समय में काशी के सबसे बड़े पण्डित समझे जाते थे और इन्होंने
स्वामी दयानन्द जी से शास्त्रार्थ भी किया था।

जैसे इस्लाम के अनुयायी
कुरान मुहम्मद साहब पर ईमान और नमाज रोजा इत्यादि ५ नियमों का
पालन करने से मुसलमान, बाईबिल और ईसा मसीह पर विश्वास रखने से
ईसाई माने जाते है। जैसे महाभारत में आर्य के गुण बतलाये हैं, वैसे हिन्दू
की कोई व्याख्या सम्भव नहीं है। जो परमात्मा को माने वह हिन्दू जो न माने
वह बौद्ध जैन भी हिन्दू, साकारवादी मूर्ति पूजक भी हिन्दू, ब्रह्म सत्यं
जगन्मिथ्या को मानने वाले भी हिन्दू । इस प्रकार हिन्दू शब्द अपने आप में
खिचड़ी बनकर रह गया है तो उसकी संस्कृति ही क्या हुई।

‘कृण्वन्तो विश्वमार्यम्’ सारे संसार को आर्य श्रेष्ठ बनाओ यह आदर्श
वाक्य ही आर्यवीर दल की महत्ताका परिचायक है। अधिकांश संगठन सीमित
या क्षुद्र लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अथवा प्रतिक्रिया स्वरूप ही बनाये जाते हैं
इनकी विचारधारा संकुचित होकर धर्म जाति यावर्ग विशेष काही हित चिन्तन
करती है। अन्य बहुत सी दुर्बलतायें भी उनमें घर कर गई हैं। यह ठीक है
कि अपने घर का सुधार किये बिना कल्याण होने वाला नहीं है परन्तु अपना
घर चाहे कितना ही स्वच्छ रहे यदि पास-पड़ौस के घरों में दुर्गन्ध विद्यमान
है तो उनसे निकलने वाली दुर्गन्ध से हम बच नहीं सकते हैं। जब दूसरों के
घरों में आग लगी हो तो उसकी लपटें हमारे घर को भी प्रभावित करेंगी,
इसमें कोई सन्देश नहीं है। इसलिये यही उचित उपाय है कि अपने घर की

सुरक्षा करते हुए अन्यत्र फैली हुई दुर्गन्ध और अग्नि को शान्त करने का
प्रयत्न किया जाये। आर्यवीर दल का लक्ष्य सभी को श्रेष्ठ बनाने का है। जहां
विश्व के सभी मानव मतभेदों को दूर करके परस्पर एक दूसरे का सम्मान
करते हुए और दूसरों की सुख सुविधा का ध्यान रखकर अपनी उन्नति कर
सकें। जीयो और जीने दो’ के उच्च आदर्श में हमारा विश्वास है।

आर्यवीर दल का इतिहास बलिदानों से भरा पड़ा है। आर्य समाज और
आर्य वीर दल ने एक शताब्दी में जितने बलिदान दिये इतने बलिदान संसार
में किसी भी धार्मिक या सामाजिक संगठन ने इस समय नहीं दिये। अमर
शहीद स्वामी श्रद्धानन्द, पं० लेखराम, मकराजपाल, आर्य वीर पं०रामप्रसाद
बिस्मिल, उदगीर के भाई श्यामलाल, वीर कशीनाथ, शहीद वेद प्रकाश, कृष्ण
राव ईटेकर और अन्य अनेक नवयुवकों ने धर्म और राष्ट्र रक्षार्थ अपने प्राणों
की बाजी लगा दी। हैदराबाद रियासत को निजामशाही से मुक्त करवाने का
शंखनाद तो प्रारम्भ ही आर्य वीरों ने किया था, जिनके शौर्य एवं बलिदान
की एक लम्बी श्रृंखला है।

उपसंहार

आर्य वीर दल ब्रह्म तेज और छात्र बल से सम्पन्न नवयुवकों का
निर्माण करने वाली राष्ट्रीय और सामाजिक संस्था है जहां शारीरिक और
आध्यामिक उन्नति के साथ साथ राष्ट्र रक्षा का संकल्प विश्व बन्धुत्व और
मानवता का पाठ पढ़ाया जाता है। आर्य संस्कृति का सन्देश जन जन तक
पहुंचाने का संकल्प चरित्रवान् नवयुवकों का निर्माण कार्य देश धर्म की रक्षार्थ
समर्पित जीवन, विश्व बन्धुत्व की भावना इन सबका समन्वित स्वरूप आर्य
वीर दल में ही देखने को मिलेगा।