अनावश्यक विचारों को कैसे नियंत्रित करें?

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अनावश्यक विचारों को कैसे नियन्त्रित करें ?

प्रेरणा पुस्तक से – डॉक्टर स्वामी देवव्रत सरस्वती (आर्य वीर दल अध्यक्ष)

मनुष्य उसे कहते हैं जो सोच विचार कर कर्म करे । व्यक्ति जैसा मन में विचार करता है वैसा वाणी से बोलता है । जैसा बोलता है वैसा हि कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा ही बन जाता है सभी कार्य विचार करके ही करने चाहियें । कहा भी है .

बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताय । बोया पेड़ बबूल का आम कहां से खाय ।।

परन्तु जब ये विचार सीमा से बढ़ जाये तब परेशानी का कारण बन जाते हैं । आयुर्वेद के अनुसार वात प्रकृति वाले अस्थिर और चंचल स्वभाव वाले होते हैं । मन की चंचलता के निम्न कारण हो सकते

१. अतृप्त इच्छायें हमारे अव चेतन मन में जन्म जन्मान्तर के संस्कार संग्रहीत हैं । जिन इच्छाओं की हम पूर्ति नहीं कर पाते वे अव चेतन मन में जड़ जमा कर बैठ जाती हैं और व्यक्ति को व्यथित करती रहती हैं ।

२. अत्यधिक भावुकता– जो व्यक्ति अन्तर्मुखी ( Entrouert ) होते हैं वे भी मन ही मन अपनी अलग खिचड़ी पकाते रहते हैं । अपनी बात को किसी को बताते भी नहीं । यह भयावह स्थित है जो कभी विस्फोट बन कर प्रकट होती है ।

३. किसी कार्य को पूरा करने की उत्कट इच्छा या आग्रह- व्यक्ति कुछ कार्यों के प्रति इतना आग्रही हो जाता है कि हर समय उसी के विषय में सोचता रहता है । जब तक वह कार्य पूरा नहीं हो जाता तब तक उसे चैन नहीं मिलता । कार्य के प्रति सावधान रहना अच्छा है परन्तु जब यह मोह या दुराग्रह में बदल जाता है तो सबको परेशान करता है ।

४. असुरक्षा की भावना- द्वितीयाद् वै भयं भवति । भय दूसरे से होता है । सबसे भयंकर मृत्यु का भय है । इसके अतिरिक्त धनहानि , व्यवसाय या नौकरी के छूटने का भय , रोग या वृद्धावस्था जन्य कष्ट , पुत्रों का अनुकूल न रहना आदि अनेक कारण हैं जिन का चिन्तन करने से व्यक्ति अधीर हो जाता है ।

 

५. भविष्य का चिन्तन- प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा होती है कि उसका भविष्य सुरक्षित रहे । उसे वृद्धावस्था में किसी प्रकार का कष्ट न हो । आर्थिक परिस्थितियाँ अनुकूल रहें और वृद्धावस्था में कोई देखरेख करने वाला रहे । पुत्र को पुत्र इसलिये कहते है कि वह माता – पिता की वृद्धावस्था रूप नरक से रक्षा करता है । उनकी लाठी बनता है । परन्तु जब पुत्र अपेक्षा के अनुरूप खरा नहीं उतरता या आज्ञा नहीं मानता तब माता – पिता की चिन्ता बढ़ जाती है । अधिक या अनावश्यक सोचना एक आदत है जिसमें अधिकांश भाग नकारात्मक होता है जैसे

 

१. अश्लील विचार- युवावस्था के प्रारम्भ में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण , इण्टरनेट , टी॰वी॰ मोबाईल के दृष्य देख उनका चिन्तन करना या उन्हें क्रियात्मक रूप में करने का प्रयत्न करना ।

 

२. निराशा के विचार- हर समय भूतकाल में आये कष्ट , असफलता , बाधाओं का चिन्तन कर किसी भी अच्छे कार्य करने का उत्साह न रहना ।

३. असफलता के विचार- सफलता और असफलता जीवन में आते ही रहते हैं । कुछ व्यक्ति आत्मविश्वास की कमी के कारण सदा असफलता का ही चिन्तन करते रहते हैं कि इस कार्य में सफलता न मिली तो क्या होगा आदि ।

४. दिवास्वप्न देखना- कुछ लोग शेखचिल्ली के समान बड़े – बड़े हवाई किले बनाते रहते है इनके अतिरिक्त और भी अनेक कारण हैं जहाँ अनावश्यक सोच – विचार ऊर्जा और उत्साह को क्षीण कर देता है । अत्यधिक सोचते रहने से हानियां –

१. धृति शक्ति दुर्बल हो जाती है । धृति का अभिप्राय धैर्य धारण करना है । इसके कम होने से व्यक्ति विपत्ति में सन्तुलित नहीं रह पाता और अनैतिक कार्यों की ओर प्रवृत्त हो सकता है ।

२. व्यक्ति के मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु सिकुड़ जाते हैं ।

३. व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता न्यून हो जाती है ।

४. उसकी निद्रा बाधित होती है और स्वप्न अधिक आते हैं ।

५. वह किसी भी कार्य को भली भाँति नहीं कर पाता ।

६. व्यक्ति मानसिक दबाव एवं तनाव ग्रस्त हो जाता है । समाधान जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि अधिक सोचना एक आदत बन जाती है जिसे निम्न उपायों से बदलना चाहिये ।

१. अतृप्त इच्छाओं की दिशा बदलें- अतृप्त इच्छाओं की पूर्ण रूप से पूर्ति सम्भव नहीं है । जैसे नदी की धारा को दूसरी दिशा में ले जाना है तो पहले उसके स्रोत पर बान्ध लगा कर दूसरी ओर पानी प्रवाहित होने का मार्ग बनाना होता है । इसी भाँति इच्छाओं का उदात्तीकरण ( Sublima tion ) कर देने से उनकी दिशा बदल जाती है और वे परेशान भी नहीं करतीं । अथवा विवेक ज्ञान से उन्हें दग्धबीज करदें ।

 

 

२. योग अभ्यास करें- मन की वृत्तियों का निरोध करने के लिये सर्वोत्तम उपाय योग है । आसनों से नाड़ी मण्डल पर शान्त प्रभाव पड़ता है । प्राणायाम से मन की पापवृत्तियाँ दब जाती हैं । मन के विकार प्रत्याहार से शान्त होते हैं । धारणा से पाप वासना दूर होती है और ध्यान समाधि से आत्मा – परमात्मा का साक्षात् कार होता है ।

३. अकेले न रहें- अन्तर्मुख या भावुक व्यक्ति अकेला ही रहना पसन्द करता है । ऐसा व्यक्ति सामान्य घटना पर ही बहुत संवेदनशील हो जाता है । संवेदना प्रकट करना बुरा नहीं है परन्तु जब उसका वेग बढ़ जाये व्यक्ति की दिशा परिवर्तित हो जाती है । इसको कम करने के लिये परिवार और मित्रों के साथ कुछ समय बात चीत , गप – शप और मनोरंजन में लगायें ।

 

४. उतावला सो बावला- एक ही काम के पीछे पड़ जाना बुद्धिमानी नहीं है । किसी भी कार्य में समय तो लगता ही है । समय पर ऋतुओं का आगमन होता है । समय पर वृक्षों पर फल लगते हैं । लोक में कहावत है- गीदड़ के जल्दी करने से बेर पक नहीं जाते । उनको पकने के लिये अपेक्षित समय चाहिये ही ।

 

 

५. अप्रमादात् भयं रक्षेत्- प्रमाद को छोड़ भय से सुरक्षा करें ‘ सावधानी हटी और दुर्घटना घटी ‘ । अधिकांश भय काल्पनिक होते हैं

 

६. अपनी आदतों को सुधारें- हम जो भी कार्य करते हैं उसके संस्कार हमारे चित्त पर पड़ते रहते हैं । ये संस्कार ही सुदृढ़ होकर आदत में बदल जाते हैं । गलत आदतों को छोड़ने के लिये अच्छी आदतों का प्रारम्भ हैं । मन में यह सदा स्मरण रखें कि मुझे अमुक आदत छोडनी ही है गलत आदतों के प्रति सावधान रहें ।

 

७. शुभ विचारों को स्थान दें- अश्लील विचार आयें तो उसके अन्तिम परिणाम का भी विचार करें । क्योंकि व्यक्ति जैसा विचार करता है वे देर – सवेर क्रिया में बदल जाते हैं । जिसका परिणाम समाज में अपयश , शासन की दण्ड व्यवस्था के साथ कलंक का टीका भी लग जाता है । जिस शरीर पर आसक्त हो रहे हैं उसका छेदन करें तो रुधिर , हाड़ , मास मल , मूत्र के अतिरिक्त कुछ भी ऐसा नहीं है जिस पर आसक्त हुआ जाये ।

 

8. वर्तमान में जीयें- जो समय व्यतीत हो गया उसका चिन्तन कर शोक या पश्चाताप करना व्यर्थ है । भविष्य में जो होगा वह देखा जायेगा उसकी चिन्ता क्यों करनी । हमारे पास जो वर्तमान है उसे ही सुधारने और सुखमय बनाने से भविष्य भी सुखमय ही होगा यह कहा जा सकता है ।

 

९ . सुखद चिन्तन निराशा और असफलता के विचारों को छोड़ सुखद जीवन का चिन्तन करना चाहिये । इसी भाँति अनहोनी घटनाओं की चिन्तन करके परेशान होना भी समझदारी नहीं है ।

 

१०. यथार्थ में जीयें- कुछ व्यक्ति हवाई किले ही बनाते रहते हैं । कुछ भी करते नहीं । उनको कुछ भी उपलब्धि नहीं होती । इसलिये जो मन में विचार किया है तदनुसार आचरण करने पर दूसरे लोग भी आप पर विश्वास करने लगेंगे । अन्य उपाय मन को उत्तेजित करने वाले और चंचल बनाने वाले कार्य क्रम टी. वी. मोबाईल , फेसबुक आदि से परहेज करें अथवा आवश्यकता होने ही इन्हें खोलें ।

 

 

२. अपने विचार की दिशा को रचनात्मक कार्यक्रमों की ओर बदल यथा – कक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करना , शरीर सौष्ठव के लिये व्यायाम करना , प्रात काल भ्रमण करना महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ना आदि ।

 

३. प्रातः काल कुछ समय मौन रहे । इस समय मन में भी विचार न आयें तो अधिक सफलता मिलेगी ।

४. अपनी जीवन ऊर्जा को रचनात्मक कार्यों में लगायें जैसे संगीत , प्राचीन वस्तुओं- सिक्के , नोट , मुद्रा , डाकटिकट देश – विदेश के अस्त्र – शस्त्र आदि का संग्रह करना । ५. सेवा कार्यों में सहयोग दें । इससे मन को शान्ति मिलेगी ।

 

 

६. अपनी दिनचर्या बनायें । सायंकाल सोने से पहले डायरी लिखे अथवा सोने से पहले लेटे लेटे ही प्रातः काल से सायंकाल तक जो – जो कार्य किये हैं उनकी पुनरावृत्ति करते हुये सो जाये ।

७. संसार के संसाधन सीमित हैं । इस लिये सब लोगों को पूरे सुखोपभोग उपलब्ध को नहीं कराया जा सकता । हाँ रोटी , कपड़ा – मकान सबके पास होना चाहिए ।

८. दिन में एक बार पसीना निकल जाये इतना व्यायाम , भ्रमण , श्रमदान । करना ही चाहिये । पसीने के साथ शरीर की बहुत सी गन्दगी बाहर निकल जायेगी और रक्त शुद्ध होकर सभी अंग – प्रत्यंगों को स्वस्थ बनाए बनायेगा

९ . क्षमा वीरस्य भूषणम् । किसी ने अपना अपराध भी किया हो तो मन से उसे क्षमा कर दें । तभी आप दूसरे को अपना बना सकते हैं ।

१०. सब से श्रेष्ठ उपाय है अपनी चिन्तन शक्ति को आत्मा – परमात्मा की ओर मोड़ देना ।

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