सार्वदेशिक आर्यवीर दल

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सार्वदेशिक आर्यवीर दल – बौद्धिक एवम शारीरिक पाठयक्रम प्रथम – द्वितीय वर्ष

– आर्य वीर दल उद्देश्य, आवश्यकता एवं आदर्श

आर्य शब्द का अर्थ ‘श्रेष्ठ व्यक्ति’ है। निरुक्त में इसका अर्थ ‘ईश्वर-पुत्रः’ किया है। जो ईश्वर का भक्त हो और उसकी आज्ञा अर्थात् वेदोक्त धर्म का पालन करे, उसे आर्य कहते हैं। आर्य के आठ लक्षण हैं-

ज्ञानी, तुष्टश्च, दान्तश्च, सत्यवादी, जितेन्द्रियः । दाता, दयालु, नम्रश्च स्यादार्यो ह्यष्टभिर्गुणैः।।

अर्थात् ज्ञान (विद्या), सन्तोष, मन पर नियन्त्रण, सत्यभाषण, इन्द्रियों को वश में करना, दान, दया और विनम्रता ये आठ गुण आर्य में होने चाहिएँ। यह शब्द संस्कृत की ‘ऋ’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘गति करना’ होता है। प्रगतिशील व्यक्ति को ही आर्य कहते हैं।

‘वीर’ शब्द ‘वीर विक्रान्तौ’ धातु से बना है। जो व्यक्ति पराक्रमी हो अथवा जिसे सम्मुख देखकर शत्रु को कँपकँपी छूट जाए उसे वीर कहा जाता है।

‘दल’ शब्द संगठन का वाचक है अथवा दलनार्थक ‘दल’ धातु से इसकी व्युत्पत्ति होती है। इस प्रकार आर्यवीर दल शब्द का अर्थ हुआ ‘ श्रेष्ठ चरित्रवान् वीरों का संगठन’। यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि पहले आर्य बनना आवश्यक है, अन्यथा केवल वीरता सज्जन लोगों की रक्षा के स्थान पर उन्हें पीड़ित भी कर सकती है। अच्छे और शूरवीर व्यक्ति भी यदि संगठन में नहीं रह सकते तो उनकी ही विजय होगी, ऐसा कहना कठिन है। इसलिए आर्यवीर में बुद्धि एवं बल, ब्राह्मण एवं क्षत्रिय के गुणों का समावेश तथा उत्कृष्ट श्रेणी का अनुशासन होना अनिवार्य है।

आर्यवीर दल का उद्देश्य :

(१) वैदिक धर्म, आर्य-संस्कृति एवं आर्य सभ्यता की रक्षा, प्रचार और प्रसार करना।

(२) समस्त उचित उपायों द्वारा आर्यजाति में क्षात्रधर्म का प्रचार, प्रशिक्षण देकर स्वात्म-रक्षण और राष्ट्र-रक्षार्थ किसी भी विपत्ति का सामना करने के लिए सन्नद्ध रहना।

(३) जनता सेवा के लिए आर्यवीरों को प्रशिक्षित करना।

संक्षेप में संस्कृति रक्षा, शक्ति सञ्चय और सेवाकार्य, आर्यवीर दल का उद्देश्य है।

आवश्यकता :

यह प्रश्न पूछना वैसा ही है जैसे कोई किसी माता से पूछे कि तुम्हें पुत्र की क्या आवश्यकता है? आर्यसमाज हमारी मातृ संस्था है, महर्षि स्वामी दयानन्द गुरु, आचार्य और पितृतुल्य पथ-प्रदर्शक हैं। जिस माता की पवित्र गोद में वेद-मन्त्रों की लोरियाँ सुनकर हमें शान्ति मिली, स्वामी दयानन्द जी के शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के सन्देश ने हममें नव-जीवन का सञ्चार किया, क्या यह उचित है कि उस माता की गोद बिना पुत्र के सूनी ही रह जाए।

प्रत्येक धार्मिक एवं राजनैतिक संगठन की युवा इकाईयाँ बनी हुई हैं, जिनसे मंजे हुए कार्यकर्ता बड़े होकर आगे संगठन का कार्य सँभालते हैं, परन्तु सैकड़ों डी॰ए॰वी॰ विद्यालयों एवं महाविद्यालयों तथा अनेक गुरुकुलों के होते हुए भी आर्यसमाज में सर्वत्र कार्यर्त्ताओं का अकाल-सा प्रतीत हो रहा है। किसी संस्था के जीवित रहने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें नया रक्त, जो उसी वर्ग का हो आता रहे।

अच्छे कार्यकर्ताओं के अभाव में अन्य संगठनों के व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से आर्यसमाज के पदाधिकारी बन बैठे और वे ऋषि दयानन्द के सिद्धान्तों के विपरीत अन्य अवैदिक कार्य करने में प्रवृत्त हो रहे हैं।

आर्यवीर दल वह फैक्ट्री है जहाँ से चरित्रवान्, बलिष्ठ, सुसंस्कृत और अनुशासित युवकों का निर्माण होता है। इन्हीं तपे हुए नवयुवकों के कंधों पर आर्यसमाज का भविष्य निर्भर है।

आर्यसमाज के अधिकारी एवं सदस्यों के बच्चों को भी आर्यसमाज में आकृष्ट करने एवं उन्हें आर्य बनाने का एक ही उपाय है कि प्रत्येक आर्यसमाज में आर्यवीर दल की स्थापना अनिवार्य की जाए। आर्यसमाजों की ओर से व्यायामशालाओं, पुस्तकालयों के अतिरिक्त बच्चों की वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, क्रीड़ा-स्पर्धाएँ रचनात्मक तथा अन्य सेवा के कार्य आर्यवीर दल के माध्यम से करवाने चाहिएँ।

अनेक सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक संगठन अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। अनेक प्रादेशिक संस्थाओं का गठन हो रहा है। कुछ संगठन देश से पृथक् होने एवं निर्दोष लोगों की बलि लेने पर तुले हुए हैं। कुछ सारे देश को ईसा की भेड़ों या इस्लाम के झण्डे के नीचे लाने का स्वप्न देख रहे हैं।

कुछ संगठन सामाजिक होते हुए भी राजनीति चला हैं। केवल आर्यसमाज और आर्यवीर दल ही ऐसा संगठन है जो अज्ञान, अन्याय और अभाव का मुकाबला करने के लिए कृतसंकल्प है, जो मनुष्यमात्र का हितैषी है, जिसमें राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई है, जाति-पाँति, छुआ-छूत का जहर जिसकी रगों में विद्यमान नहीं है, संस्कृति-रक्षा, शक्ति सञ्चय एवं मानवमात्र की सेवा करना ही जिसका आदर्श है, जिसका खुला संविधान एवं व्यावहारिक जीवनदर्शन है, “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” सारे संसार को श्रेष्ठ बनाओ’ ही जिसका उद्घोष है और देव दयानन्द के सपनों का ‘आर्यराष्ट्र’ निर्माण करने का अरमान है।

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