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यह प्रश्न पूछना वैसा ही है जैसे कोई किसी माता से पूछे कि
तुम्हें पुत्र की क्या आवश्यकता है? आर्यसमाज हमारी मातृ संस्था है, महर्षि स्वामी दयानन्द गुरु, आचार्य और पितृतुल्य पथ-प्रदर्शक हैं। जिस माता की पवित्र गोद में वेद-मन्त्रों की लोरियाँ सुनकर हमें
शान्ति मिली, स्वामीजी के शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के सन्देश ने हममें नव-जीवन का सञ्चार किया, क्या यह उचित है कि उस माता की गोद बिना पुत्र के सूनी ही रह जाए

प्रत्येक धार्मिक एवं राजनैतिक संगठन की युवा इकाइयाँ बनी हुई हैं, जिनसे मंजे हुए कार्यकर्ता बड़े होकर अगले सङ्गठन का कार्य सँभालते हैं, परन्तु सैकड़ों डी०ए०वी० विद्यालयों एवं महाविद्यालयों तथा अनेक गुरुकुलों के होते हुए भी आर्यसमाज में सर्वत्र कार्यकर्ताओं का अकाल-सा प्रतीत हो रहा है। किसी संस्था के जीवित रहने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें नया रक्त, जो उसी वर्ग का हो, आता रहे।

अच्छे कार्यकर्ताओं के अभाव में अन्य सङ्गठनों के व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से आर्यसमाज के पदाधिकारी बन बैठे और ऋषि दयानन्द के सिद्धान्तों के विपरीत अन्य अवैदिक कार्य करने में प्रवृत्त हो रहे हैं।

आर्यवीर दल वह फैक्ट्री है जहाँ से चरित्रवान्, बलिष्ठ, सुसंस्कृत और अनुशासित युवकों का निर्माण होता है। इन्हीं तपे हुए नवयुवकों के कन्धों पर आर्यसमाज का भविष्य निर्भर है।

आर्यसमाज के अधिकारी एवं सदस्यों के बच्चों को भी आर्यसमाज में आकृष्ट करने एवं उन्हें आर्य बनाने का एक ही उपाय है कि प्रत्येक आर्यसमाज में आर्यवीर-दल की स्थापना अनिवार्य को जाए। आर्यसमाजों की ओर से व्यायामशालाओं, पुस्तकालयों के अतिरिक्त बच्चों की वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ, क्रीड़ा-स्पर्धाएँ तथा

अन्य सेवा के कार्य आर्यवीर-दल के माध्यम से करवाने चाहिए।

अनेक सामाजिक, धार्मिक व राजनैतिक सङ्गठन अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए युवकों को पथभ्रष्ट कर रहे हैं। अनेक प्रादेशिक संस्थाओं का गठन हो रहा है। कुछ सङ्गठन देश से पृथक् होने एवं निर्दोष लोगों की बलि लेने पर तुले हुए हैं। कुछ सारे देश को ईसा की भेड़ों या इस्लाम के झण्डे के नीचे लाने का स्वप्न देख रहे हैं कुछ सङ्गठन सामाजिक होते हुए भी राजनीति चला रहे हैं।

केवल आर्यसमाज और आर्यवीर-दल ही ऐसा सङ्गठन है जो अज्ञान, अन्याय और अभाव का मुकाबला करने के लिए कृतसंकल्प है, जो मनुष्यमात्र का हितैषी है, जिसमें राष्ट्रियता कूट-कूट कर भरी हुई है, जाति-पाँति, छुआ-छूत का ज़हर जिसकी रगों में विद्यमान नहीं है, संस्कृति-रक्षा, शक्ति-सञ्चय एवं मानवमात्र की सेवा करना ही जिसका आदर्श है, जिसका खुला संविधान एवं व्यावहारिक जीवनदर्शन है, “कृण्वन्तो विश्वमार्यम् ‘ ‘सारे संसार को श्रेष्ठ बनाओ’ ही जिसका उद्घोष है और देव दयानन्द के सपनों का आर्यराष्ट्र’ निर्माण करने का अरमान है।

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