शहीद भगतसिंह का अपनी माँ को उत्तर
आज़ादी की दुल्हन मेरे कफन की चुनरी ओढ़े ।
आएगी माँ घर तेरे दिन रह गए थोड़े ।।
मौत बनेगी मेरी दुल्हन, है अभिशाप गुलामी का बन्धन ।
रंग लाएगी कुर्बानी माँ हिल जाएगा ब्रिटिश शासन ।
जन्म दुबारा लेकर के जंजीर सितम की तोड़ें ।।
भूल न जाना आर्य समाज 👇🏻 https://aryaveerdal.in/bhul-na-jana-aary-samaj
सच माँ नहीं फाँसी का डर है नाशवान् देह जीव अमर है।
अब तो हथेली के ऊपर सिर है फिर मरने का हमें क्या डर है।
जालिम के कब तक सहेंगे नंगे बदन पर कोड़े ।।२।।
देश की खातिर मर जाएँगे, मर कर के भी फिर आएँगे।
आकर के दुश्मन के ऊपर बम और गोली बरसाएँगे ।।
कसम मादरे हिन्द फिरंगी को जिन्दा हम ना छोड़ें।।३।।
हम इतने अनजान नहीं माँ इस जीने में शान नहीं माँ ।
मातृ भूमि की रक्षा करना फर्ज है यह अहसान नहीं माँ ।।
हक चाहते हैं भीख नहीं हम ‘कर्मठ’ हाथ क्यों जोड़ें।।४।।
शहीदों की याद👉🏻https://aryaveerdal.in/shahido-ki-yad/

