जब ईश्वर की कृपा होगी, तभी ईश्वर पर विश्वास होगा
महर्षि दयानन्द सरस्वती और मुंशी राम जी के बीच बरेली में हुआ एक प्रेरक संवाद
* यद्यपि आचार्य दयानन्द के उपदेशों ने मुझे मोहित कर लिया था, तथापि मैं मन में सोचा करता था कि यदि ईश्वर और वेद के ढकोसले को पण्डित दयानन्द स्वामी तिलाञ्जलि दे दें तो फिर कोई भी विद्वान उनकी अपूर्व युक्ति और तर्कणा-शक्ति का सामना करनेवाला न रहे। मुझे अपने नास्तिकपन का उन दिनों अभिमान था।
* एक दिन ईश्वर के अस्तित्व पर आक्षेप कर डाले। पाँच मिनट के प्रश्नोत्तर में ऐसा घिर गया कि जिह्वा पर मुहर लग गयी।
* मैंने कहा- “महाराज ! आपकी तर्कणा बड़ी तीक्ष्ण है। आपने मुझे चुप तो करा दिया, परन्तु यह विश्वास नहीं दिलाया कि परमेश्वर की कोई हस्ती (अस्तित्व) है।”
* दूसरी बार फिर तैयारी करके गया, परन्तु परिणाम पूर्ववतू हो निकला।
* तीसरी बार फिर पूरी तैयारी करके गया परन्तु मेरे तर्क को फिर पछाड़ मिली।

* मैंने फिर अन्तिम उत्तर वही दिया- “महाराज ! आपकी तर्कणा-शक्ति बड़ी प्रबल है। आपने मुझे चुप तो करा दिया परन्तु यह विश्वास नहीं दिया कि परमेश्वर की कोई हस्ती है।”
* महाराज पहले हँसे, फिर गम्भीर स्वर से कहा “देखो, तुमने प्रश्न किये, मैंने उत्तर दिये यह युक्ति की बात थी।
* मैंने कब प्रतिज्ञा की थी कि मैं तुम्हारा विश्वास परमेश्वर पर करा दूँगा ?
* तुम्हारा परमेश्वर पर विश्वास उस समय होगा जब वह प्रभु स्वयं तुम्हें विश्वासी बना देंगे।”
सौजन्य : आर्य वीर दल, बिहार प्रदेश
स्वामी श्रद्धानन्द जी
आचार्य संजय सत्यार्थी
आर्योपदेशक, पटना
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