संभागीय शीतकालीन सात दिवसीय शिविर

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स्वामी श्रध्दानंद बलिदान दिवस – दुर्ग

एवं संभागीय शीतकालीन सात दिवसीय शिविर के समापन दिवस व आर्य समाज मंदिर, आर्य नगर दुर्ग स्थापना दिवस कार्यक्रम के अवसर पर आपका स्वागत है।

  • कार्यक्रम स्थल

स्थान – घनश्याम सिंह आर्य कन्या महाविद्यालय मैदान, आर्य नगर दुर्ग (छ.ग.)

दिनांक – 27 दिसम्बर 2024, शुक्रवार, समय – शाम 04:00 बजे

आयोजक आर्यवीर दल दुर्ग – भिलाई

सम्पर्क सूत्र

6263473977, 9753461642

प्रखर वैदिक प्रवक्ता

(सनातन महासंघ के अध्यक्ष)

राष्ट्रवादी चिंतक !

इनकी शिक्षा सर्वाधिक प्राचीन गुरूकुल काँगड़ी से हुई है, इन्हे हिन्दी पत्रकारिता तथा वैदिक साहित्य विषय में परास्नातक की उपाधि प्राप्त है व “मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम व योगेश्वर श्री कृष्ण” पर पीएचडी भी कर रहे है, वे ईसाई मिशनरी तथा इस्लामिक धर्मांतरण के षडयंत्र को रोकने हेतु विश्व भर में भ्रमण कर युवाओं में धर्म जागरण अभियान चला रहे है, साथ ही उनका संकल्प है की श्री राम लला गुरूकुल का निर्माण करना है, जिसके लिये वे भिक्षा अभियान भी चला रहें है। उनके सोशल मीडिया पे तीस लाख से अधिक फॉलोवर्स है, जहां धर्म प्रचार के वैज्ञानिक तथ्यात्मक पहलुओं को वे उजागर करते है।

गौतम खट्टर जी

कार्यक्रम विवरण

26.12.2024, गुरुवार

प्रातः – 08:00 बजे दीक्षांत समारोह

दोपहर – 02:00 बजे पथ संचलन आर्यवीर दल (साहिल आर्य के नेतृत्व में)

27.12.2024, शुक्रवार सायं – 04:00 बजे

आर्यवीर दल प्रदर्शन सायं – 05:00 बजे

स्वागत गीत, एवं नुक्कड़ नाटक सायं – 06:00 बजे

आर्यवीर प्रमाण पत्र वितरण एवं मुख्य अतिथियों का उ‌द्बोधन

सायं – 06:30 बजे – ‘गौतम खट्टर जी‘ का उ‌द्बोधन

स्वामी श्रद्धानंद

सरस्वती महान क्रांतिकारी सन्यासी

  • स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम विज) का जन्म 22 फरवरी सन् 1856 (फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी विक्रम संवत् 1913), को पंजाब प्रांत के जालंधर जिले के तलवान ग्राम मे एक खत्री परिवार में हुआ था।

युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानंद जी के तर्को और आशीर्वाद से मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

इनके गुरू स्वामी दयानंद सरस्वती जी थे, उन्ही से प्रेरणा लेकर स्वामी श्रद्धानंद जी ने आजादी और वैदिक प्रचार का प्रचण्ड रूप में आंदोलन खड़ा कर दिया था।

मुंशीराम जी की पत्नी का नाम शिवा देवी था, जो कि लम्बे समय से बीमारी से जूझ रही थी। पत्नी शिवा देवी की आकस्मिक मृत्यु हो जाने के बाद मुंशीराम दीक्षा लेकर स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती बने ।

कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ रही पुत्री अमृतकला के मुख से “ईसा – ईसा बोल तेरा क्या लागेगा मोल” यह पक्ति सुनकर स्वामी जी ने गुरूकुल स्थापना करने का संकल्प लिया।

सन् 1902 में स्वामी जी ने हरिद्वार में गुरूकुल की स्थापना की जो आज भारत के प्राचीनतम गुरुकुलों में से एक है जो कि कांगड़ी गुरूकुल के नाम से विश्वविख्यात है।

स्वामी जी ने नई दिल्ली में स्थित जामा मस्जिद में वेद मंत्र का पाठ किया था। ऐसा करने वाले वे भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी एवं महान सन्यासी थे।

  • स्वामी श्रद्धानंद शुद्धि आंदोलन के पितामह कहे जाते है। शुद्धि आंदोलन के चलते लाखों मुसलमानों और ईसाईयों ने पुनः हिन्दु धर्म अपनाकर घर वापसी की थी, वर्तमान में इसे घर वापसी आंदोलन कहा जाता है, जो आज भी आर्यसमाज द्वारा चलाया जा रहा है।

इनके इन्ही सबकार्यों के चलते 23 दिसंबर सन् 1926 को अब्दुल राशिद नामक इस्लामिक कट्टर पंथी ने धर्म चर्चा के नाम पर उनके कक्ष में प्रवेश कर उनकी गोलीमार कर हत्या करदी।

  • डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कहा था कि स्वामी श्रद्धानंद जी अछुतो के सबसे महानतम और सच्चे हितैषी है।

स्वामी श्रद्धानंद जी ही वो महान राजनेता थे, जिन्होने गांधी जी को ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी।

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