प्रिय आर्यवीरों
वर्षा ऋतु की समाप्ति और शरद ऋतु का आगमन होने वाला है। इस ऋतु में वर्षा ऋतु में संचित पित्त सूर्य की किरणों से संतप्त होकर प्रकुपित हो जाता है। जिसको कारण मलेरियां, अम्लपित्त, मन्दाग्नि, जैसे रोग उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिये इस ऋतु में खट्टे, चटपटे, तले हुये, करेला, दही, छाछ इत्यादि का सेवन न करें। पित्त निवारण के लिये गुनगुने पानी में नमक डाल कर ३-४ गिलास पी लें और मुख में अंगुली देकर वुमन द्वारा उसे निकाल दें। कभी-कभी गिलोय का काढा बना कर पी लों।
दिनचर्या –
अपनी दिनचर्या निम्न प्रकार से बनायें- ४-५ बजे प्रात: जागरण, उष:पान, शौच, दन्तधावन पश्चात् व्यायाम, भ्रमण, आसन-प्राणायाम का अभ्यास आधा घण्टा । पसीना सूख जाने पर स्नान, सन्ध्या, यज्ञ, स्वाध्याय। सायंकाल विद्यालय से आकर अल्पाहार, थोड़ा विश्राम, विद्यालय में दिये कार्य का लेखन एवं स्मरण करने के पश्चात् आर्यवीर की शाखा में निर्धारित व्यायाम का अभ्यास स्वयं करें और दूसरे आर्य वीरों को करवायें ।
शाखा स्थल से लौटकर यदि आवश्यकता हो तो स्नान अथवा हाथ-पैर धोकर १ घण्टा अध्ययन / भोजन के पश्चात् कुछ समय पारिवारिक जनों से वार्तालाप, मनोरंजन, समाचार इत्यादि सुनें और फिर १ घण्टा पढ़ने में लगायें। सायंकाल दस बजे तक सब कार्य पूरा करके ६ घण्टे की गाढ़़ निद्रा लें । इस ऋतु में दिन में सोना निषिद्ध है। ऐसे ही रात्रि में खुले स्थान और ओस में नहीं सोना चाहिये ।
आर्यवीर दल की शाखा-
प्रातः काल 5-6 बजे – ध्वजारोहण, सर्वांगसुन्दर व्यायाम, नमस्कार के व्यायाम आसन-प्राणायाम, दण्ड-बैठक तथा नियुद्धम का अभ्यास ।
सायंकाल – दण्ड संचालन, शूल संचालन, आत्मरक्षा एवं खेल।

