महात्मा स्वामी नारायण जी का संक्षिप्त् जीवन परिचय

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परम पूज्य महात्मा स्वामी नारायण जी का जीवन आर्यसमाज के इतिहास में एक कर्मशील का उज्ज्वल अध्याय है | उनका जीवन कर्त्तव्यनिष्ठा, तप, साहस एवं आत्म विश्वास का एक ऐसा उदाहरण है जो प्रत्येक पथिक को सुमार्ग पर चलने का पथनिर्देश कर सकता है | वे महर्षि दयानन्द के उन अनुयायियों में से थे जिन्होंने महर्षि के मनतव्यों का आंख बन्द कर अनुसरण न कर उन्हें समझा, परखा और स्वविवेक की तुला पर तोला और फिर उनको लेकर, जनसाधारण के उपकार हेतु, उन मंतव्यों के प्रचार-प्रसार का दृड़ व्रत लेकर संसार संग्राम में उतर पड़े | इस प्रयास में वे सफल भी हुए, इसमें सन्देह नहीं |

महात्मा स्वामी नारायण

जन्म : – महात्मा नारयण स्वामी का जन्म सन् 1865 ई. में अलीगढ़ में हुआ था | उनके पूर्वज धौलपुर में श्रृंगारपुर ग्राम के रहने वाले थे | उनके परम पितामह श्री सुखलाल जी बनारस के महाराज बेतसिंह जी के मन्त्रियों में से थे | इनके जन्म के समय इनके पिता जी अलीगढ़ में सरकारी नौकरी कर रहे थे | आप का जन्म का नाम नारायण प्रसाद था |

शिक्षा : – उस समय की प्रथा के अनुसार आपने सात वर्ष की अवस्था के बाद फारसी के मकतब में शिक्षाभ्यास आरम्भ किया | कुछ वर्ष बाद अंग्रेजी भी पढ़ी | हिन्दी पढ़ने की बारी बाद में आई | जिन दिनों वे स्कूल में पढ़ रहे थे, महर्षि दयानन्द अलीगढ़ आये | उनका जलूस सामने से गुजर रहा था | उत्सुकतावश बच्चे उस जलूस को देखने जाने लगे तो संस्कृत के अध्यापक ने यह कह कर रोक दिया कि यह व्यक्ति अधर्मी है और इसे देखने से भी पाप लगेगा | जिस व्यक्ति के देखने से ही पाप लगता हो उस व्यक्ति का व्याख्यान सुनने का तो कोई अर्थ ही नहीं | बाद में महात्मा नारायण स्वामी को सदा इस निर्णय पर दुख रहा | इसके बाद वे महर्षि दयाननद के दर्शन कभी न कर सके |

विवाह एवं गृहस्थ : – तेइस वर्ष की अवस्था में आपका विवाह हुआ | उस समय आप मुरादाबाद में कलैक्टर के दफ्तर में क्लर्क लगे हुए थे | उस समय की प्रथा के अनुसार आप मुरादाबाद में व उनकी पत्नी, उनकी माता जी के पास अलीगढ़ में रहती थी | सन् 1896 में उनके पिताजी का देहावसान हो गया |

सन् 1899 में उनकी माता जी का भी देहान्त हो गया | तब आप अपनी पत्नि को अपने पास ले आए | आपकी पत्नी एक आदर्श पत्नी थी | गृहकार्य में अत्यन्त निपुण एवं कर्मढ थी | साथ ही अपने पति के आदर्शों के प्रति भी पूरी तरह समर्पित थी | आपने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मैंने अपने को सौभाग्यवान समझा कि विवाह में अपनी आवाज न होने पर भी मुझे एक समझदार, कर्त्तव्यपरायणा देवी की संगति प्राप्त हुई | परन्तु गृहस्थी का सुख उनके भाग्य में नहीं था | सन् 1909 में उनके यहां प्रथम संतान हुई और वह पुत्र दो महीने में चल बसा | इसके बाद दो वर्ष बाद दूसरी संतान के होने पर पत्नी व बच्चे दोनों का देहान्त हो गया | उस समय नारायण प्रसाद जी की आयु 43 वर्ष की थी | इस समय तक वे आर्यसमाज के क्षेत्र में पहचाने जाने लगे थे |

आर्य समाज के प्रति रुचि एवं कार्य : – परम्परागत सनातनी परिवार में उत्पन्न होने के कारण, प्रारम्भ में ही उन पर धार्मिक संस्कारों का प्रभाव रहा | उस समय पाप-पुण्य की परिभाषा बड़ी जटिल थी | महर्षि के दर्शन न कर सके क्योंकि अध्यापक ने कह दिया “पाप लगेगा” | विवाह पर यज्ञोपवीत धारण तो किया पर बाद में उतार दिया क्योंकि पण्डित जी ने कहा “पाप लगेगा” |

जो व्यक्ति जिज्ञासु होते हैं वे अपने लिये सुमार्ग पा ही लेते हैं | नारायण प्रसाद जी आर्यसमाजियों के विषय में जो सुनते थे उसके अनुसार “उनका अपना कोई सिद्धान्त नहीं होता | वे केवल खंडन करना जानते हैं |” एक दिन मुरादाबाद अपने मित्र के घर गए | वहां उन्हें आर्यसमाज के दस नियमों को पढ़ने का अवसर मिला | उन्होंने देखा कि नियमों में न कोई खंडन है, न मंडन | आर्यसमाज के प्रति उनकी धारणा कितनी गलत थी | उसी मित्र से सत्यार्थ प्रकाश लेकर पढ़ा, और उनके ज्ञान चक्षु खुल गए | वहीं से प्रेरणा लेकर उन्होंने नियमित यज्ञोपवीत धारण करना आरम्भ कर दिया | साथ “सत्यार्थप्रकाश से प्रेरित होकर, बहुत विचार कर उन्होंनें अपने लिए कुछ नियमों का निर्धारण किया और निश्चय किया कि इन नियमों का पालन आजीवन करूंगा |

नियम निम्न थे : –

1. कभी मांस-मदिरा का सेवन नहीं करूंगा |
2. कभी थियेटर, सिनेमा न देखूंगा |
3. नियमपूर्वक संध्या और हवन करूंगा |
4. ईमानदारी व परिश्रम से जीविका उपार्जन करूंगा |
5. यत्न करूंगा कि एक सद् गृहस्थ की भांति जीवन यापन करूं |
6. संस्कृत व अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करने का पूरा प्रयत्न करूंगा |

यहां से आपके सार्वजनिक जीवन की यात्रा आरम्भ हो गई | पहले उनका कार्यक्षेत्र मुरादाबाद व उसके आस पास के समाजों तक ही सीमित था | धीरे-धीरे उनका कार्यक्षेत्र विस्तृत होता गया |

गुरुकुल वृन्दावन : – पत्नी की मृत्यु के बाद आपने नौकरी छोड़ दी और अपना सारा समय आर्यसमाज के प्रचार प्रसार में लगा दिया | सन् 1911 ई. में फर्रूखाबाद में एक गुरुकुल की स्थापना हो चुकी थी | उसके लिए वृन्दावन में भूमि उपलब्ध होने पर उसे वृन्दावन लाना था | यह कार्य मुश्किल व परिश्रम-साध्य था | वहाँ विद्यार्थियों के लिए आवास बनाने थे | यह कठिन कार्य महात्मा नारायण प्रसाद जी को सौंपा गया जिसे उन्होंने पूरी योग्यता से निभाया और गुरुकुल वृन्दावन में आ गया |

बाद में आप वहां के मुख्याधिष्ठाता नियुक्त हुए | आपके समय में गुरुकुल वृन्दावन ने चहुंमुखी उन्नति की | दस वर्ष तक आप वहां सेवा कार्य करते रहे | उसे पूरी तरह सुरक्षित करके, आपने और अधिक विस्तृत सामाजिक, धार्मिक कार्यक्षेत्र में प्रवेश किया |

गुरुकुल छोड़ते समय आपको भावभीनी विदाई दी गई व अभिनन्दन किया गया | अब आपका विचार स्वाध्याय एवं योगाभ्यास में कुछ समय बिताने का था | उसके लिए एकान्तवास चाहिये | ऐसा स्थान जहां आराम से शान्तिपूर्वक स्वाध्याय कर सकें, ढूढ़ना आरम्भ किया और अन्त में जिला अलमोड़ा में रामगढ़ तल्ला में एक स्थान आपको पसन्द आया | इस प्रकार सन् 1920 के दिसम्बर मास में रामगढ़ तल्ला में 

नारायण आश्रम का श्री गणेश हुआ | यह स्थान अत्यन्त सुरम्य एवं प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण था | आश्रम के नीचे नदी की कलकल करती धारा, चारों और हरियाली भरी पर्वतमाला, एकान्त साधना के लिए उपयुक्त स्थान मिल गया और धीरे-धीरे वहां रहने के लिए कमरे भी बन गए |

संयास आश्रम में प्रवेश‌ : – 22 मई 1922 के दिन, नारायण आश्रम में ही आपने स्वामी सर्वदानन्द जी से संन्यास की दीक्षा ली | आपने नाम न बदल कर अपने नाम के पीछे स्वामी लगाना आरम्भ कर दिया | अब आप आर्यजगत् में महात्मा नारायण स्वामी जी के नाम से प्रसिद्ध हुए |

मथुरा में दयानन्द शताब्दि : – सन् 1923 में आप सर्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान चुन लिए गए | इस दायित्व के साथ ही सन् 1925 ई. में होनेवाली दयानन्द शताब्दि के प्रबन्ध का दायित्व भी आपको सौंप दिया गया | इस समय तक महात्मा नारायण स्वामी आर्यजगत के एक कर्मठ एवं समर्थ नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे | महर्षि की जन्मशताब्दि के प्रबन्ध का उत्तरदायित्व आपने अत्यन्त प्रसन्नता से ग्रहण किया और अत्यन्त कुशलता और सफलता से निभाया भी |

यह एक महान आयोजन था | सम्पूर्ण भारत ही नहीं अपितु विदेशों से भी आर्यजनों का इस सम्मेलन में सम्मिलित होना निश्चित था | मथुरा नगर के स्टेशन के पास ही भूमि ली गई और उस पर बृहत् दयानन्द नगर का निर्माण किया गया | हर एक प्रान्त से आने वाले आर्यजनों के लिए पृथक्-पृथक् आवास स्थान बनाए गये | अन्य आवश्यक सुविधाएं भी उसी प्रकार जुटाई गई | आने वालों की सुविधा के लिए दुकानें भी लगाई गई | एक सर्वसुविधा-युक्त नगर की स्थापना करना सरल कार्य नहीं था | उस कार्य को सुचारु रूप से चलाने का कार्य आर्य स्वयं-सेवक ही सम्हाल रहे थे | पुलिस की ओर से व्यवस्था करने के आग्रह को अस्वीकार कर दिया गया | अनुशासन व व्यवस्था की दृष्टि से यह आयोजन अभूतपूर्व रहा |

लगभग एक लाख आर्यजन इस आयोजन में सम्मिलित हुए और अत्यन्त व्यवस्थित ढंग से सारा कार्य सम्पन्न हुआ | नगर की दुकानों पर बीड़ी सिगरेट आदि बेचने का निषेध था | इलाहाबाद से आए एक वकील साहब को विश्वास नहीं हुआ | उनका विचार था कि सिगरेट चोरी छुपे तो अवश्य मिलता होगा | वे स्वयं बाजार गए और प्रयत्न किया | पर निराश रहे, कहीं भी सिगरेट बीड़ी नहीं मिली |

उत्सव में पुलिस का कोई प्रबन्ध नहीं था | सारी व्यवस्था आर्यवीरों के हाथ में थी | इतनी भीड़ में इन दिनों न तो कोई चोरी हुई, न लड़ाई-झगड़ा | इस प्रकार यह इतना बड़ा आयोजन शान्तिपूर्वक सफल हुआ |

इस समारोह का प्रारम्भ नगर कीर्तन एवं शोभायात्रा से हुआ | स्वामी श्रद्धानन्द जी उस समय सार्वदेशिक सभा के संरक्षक प्रधान थे | इसके अतिरिक्त वे आर्यजगत के सबसे वरिष्ठ एवं प्रतिष्ठित नेता भी थे | शोभायात्रा में सबसे आगे काषाय वस्त्रों में, स्वामी श्रद्धानन्द जी, हाथ में ओउम् ध्वज लिए नेतृत्व कर रहे थे | उनके पीछे अन्य संन्यासीगण व बैण्ड बाजा था | उसके पीछे अपने अपने बैनर लिए हजारों आर्य नर-नारी भजन गाते हुए अनुशासन में चल रहे थे | यह दृष्य अभूतपूर्व था |

इतने बड़े आयोजन के लिए धन एकत्र करने में महात्मा नारायण स्वामी जी को अथक परीश्रम करना पड़ा था | सब कार्य सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गए | पर महात्मा जी का स्वास्थ्य खराब हो गया | जांच के बाद पता चला कि अपैंडिक्स का आपरेशन‌ करना पड़ेगा | आपको बरेली लाया गया और वहां डा. भाटिया ने आपका आपरेशन किया |

महर्षि की जन्मशताब्दि टंकारा में भी मनाई गई और महात्मा जी वहां भी पहुंचे और ग्राम में आर्यसमाज की स्थापना की | बाद में सन् 1926 ई. में रामगढ़ तल्ला में भी आर्यसमाज बनाया |सन 1926 के 23 दिसम्बर को एक धर्मांध मुसलमान द्वारा स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या कर दी गई | आर्यजगत् में हाहाकार मच गया | उस समय वे आर्यजगत के सर्वमान्य सर्वोच्च नेता थे | देशभर से आर्यजन देहली में एकत्र हो गए | उस समय महात्मा नारायण स्वामी ने उस शवयात्रा का नेतृत्व किया | उन्हीं के शब्दों में “शव के साथ जो जलूस था, वह असाधारण था | उसमें एक लाख से कम आदमी न होंगे | जलूस को शमशान तक पहुँचाने में सात घण्टे लगे | उत्तम रीति से पुष्कल घृत सामग्री से उनकी अन्त्येष्टि की ग‍ई | अन्त्येष्टि के बाद महात्मा नारायण स्वामी ने उन्हें श्रद्धाञ्जली दी |
स्वामी श्रद्धानन्द जी की स्मृति में “स्वामी श्रद्धाननद स्मृति ट्रस्ट स्थापित किया गया | जिस किराये के मकान में स्वामी जी रहते थे , उस मकान को खरीदकर उसका नाम “श्रद्धानन्द बलिदान भवन” रखा गया | स्वामी जी उस समय “आर्य शुद्धि सभा” के प्रधान थे | उनके बाद महात्मा नारायण स्वामी को शुद्धि सभा का प्रधान चुन लिया गया और वे बलिदान भवन में रहने लगे | गर्मियों में आप रामगढ़ तल्ला कुछ महीनों के लिए अवश्य जाते |

आर्य विरक्त (वानप्रस्थ एवं संन्यास) आश्रम की स्थापना –
क‍ई वर्षों से महात्मा नारायण स्वामी जी की इच्छा थी कि हरिद्वार में कोई अच्छी भूमि खरीद कर “आर्य वानप्रस्थ आश्रम” की स्थापना की जाय | बहुत से आर्य सज्जन इस शुभ कार्य में सहायता करने को उत्सुक थे | श्री खुशीराम जी, रिटायर्ड पोस्ट मास्टर (लाहोर), श्री तुलसी राम जी, श्री गंगाराम जी, चीफजज (टिहरी) ने आपके साथ पूरा सहयोग दिया व भूमिचयन में सहायता की | काफी विचार विमर्श के बाद गंग नहर के पश्चिमी तट पर सन् 1926 ई. में भूमि खरीद ली ग‍ई | नहर के दूसरी और गुरुकुल कांगड़ी का विस्तार हो चुका था | इस भूमि की रजिस्ट्री आर्य प्रतिनिधि सभा संयुक्त प्रांत के नाम से करा दी ग‍ई |
सर्वप्रथम महात्मा नारायण स्वामी जी व अन्य तीन महानुभावों ने कुटिया का निर्माण किया | इस समय कुछ आधारभूत नियम बनाए गए : –

1. भूमि आर्यप्रतिनिधि सभा सं.प्रा. की है | पर अन्य सब आन्तरिक अधिकार आश्रम प्रधान व अन्तरंग सभा वहन करेगी |
2. कुटी निर्माता के उत्तराधिकार को केवल एक पीढ़ी तक सीमित कर दिया गया | उसके बाद वह आश्रम की हो जाएगी |
3. इसके अतिरिक्त वानप्रस्थियों की दिनचर्या एवं आचार संहिता भी बनाई ग‍ई | इन नियमों पर चलकर वानप्रस्थी आर्यजन अपना समय, भलीभांति ईश्वर साधना, सेवा आदि कार्यों में लगा सकें | आज आर्य वानप्रस्थ आश्रम में लगभग 400 कुटिया हैं तथा अन्य बहुत सी सुविधाएं उपलब्ध है |
इस प्रकार सन् 1926 में महात्मा जी ने कई महत्वपूर्ण योजनाएं आरम्भ कीं : –

आर्यवीर दल की स्थापना : – अमर हुतात्मा स्वामी श्रद्धाननद की हत्या से आर्यजनता में बहुत रोष व्याप्त हो गया था | यह निश्चय था कि उनकी हत्या एक बड़े षड़य‌न्त्र के अन्तर्गत कराई ग‍ई थी | जनता चाहती थी इस षड्यन्त्र का पर्दाफाश करके, दोषियों को पकड़ा जाय | सरकार ने इस विषय में कोई कदम नहीं उठाया | उसके विपरीत आर्यसमाज की सभाओं, नगर कीर्तनों में भी बाधाएं डालनी आरम्भ कर दीं | इन कारणों से आर्यजनों में असन्तोष उत्पन्न होना स्वभाविक था | इन सब कारणों से आर्य सार्वदेशिक सभा को कुछ निर्णय लेने पड़े | इन बातों पर विचार विनिमय करने के लिये आर्य महासम्मेलन करने का निश्चय किया गया |
पहला आर्य सम्मेलन देहली में आयोजित हुआ | इसमें समस्त देश की आर्य समाजों के प्रतिनिधि उपस्थित हुए |
इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ निर्णांयक कदम उठाए जाएं, जिसमें धरना, सत्याग्रह आदि शामिल हों | साथ ही इस कार्य के लिए 50,000 रु. एवं 10,000 स्वयं सेवक भी तैयार किये जायें | इन सब कार्यों को करने के लिए महात्मा नारायण को सर्वाधिकार दे दिया गया |
एक वर्ष के भीतर ही 10,000 से अधिक आर्यवीर तैयार हो गए | इनको बकायदा शिक्षित किया और अनुशासन की ट्रेनिंग दी ग‍ई | इस प्रकार से विधिवत् आर्यवीर दल की स्थापना हो ग‍ई |

आर्यसमाज बरेली : – जुलाई सन् 1925ई. में महात्मा जी ने प्रचारार्थ काश्मीर की यात्रा की | वहां का कार्य बीच में ही छोड़कर आना पड़ा क्योंकि बरेली आर्यसमाज पर पुलिस ने ताला लगा दिया था | कारण, ईद के दिन आर्यसमाज मन्दिर के सामने से गुजरते हुए जलूस ने आर्यसमाज में घुसकर तोड़फोड़ की थी | मुसलमान दरोगा ने इसमें आर्यसमाज का ही दोष माना और ताला लगाकर पहरा बिठा दिया | स्थानीय नेताओं को लेकर महात्मा जी नें वहां के बड़े-बड़े अधिकारियों से भेंट की और धमकी दी अगर कल तक आर्यसमाज मन्दिर से पहरा नहीं उठाया गया तो वे भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे | चार घण्टे में ही पहरा उठा लिया गया, ताला खोल दिया गया |

बिहार प्रान्त में : – बरेली का झगड़ा निपटा कर महात्मा जी बिहार की प्रचार यात्रा के लिए निकल पड़े | रांची में आर्यसमाज की और से उरांव जाति के उत्थान के लिए, उनके अन्धविश्वास मिटाने के लिए आर्य उपदेशक लगे हुए थे | उनको मदिरा मांस के दुर्गुण बताकर उन कुरीतियों से विमुख करने का भी प्रयास हो रहा था | विद्यार्थियों के लिए छात्रावास भी खोले गए थे | उरांवो में जागृति पैदा करने का प्रयास धीरे-धीरे असर कर रहा था | बिहार के अन्य कुछ आर्यसमाज मन्दिरों में उपदेश करके वे लौटे |
बिजनोर जिले के धामपुर कस्बे में पहुँचे | वहां उनकी भेंट पुलिस चौकी के एक चौकीदार से हुई | उसका नाम बहाल सिंह गूजर था | वह अनपढ़ था परन्तु आर्यसमाज के सत्संगों में जाने का शौक था | वहां उपदेश सुनसुन कर वह दृढ़ आर्य बन गया था | रात को गश्त लगाते हुए वह चिल्लाता “पांच सौ वर्षों से सोने वालो जागो” जब लोग इसका तात्पर्य पूछते तो कहता “इसका उत्तर तुम्हें सत्यार्थ-प्रकाश में मिलेगा” उस समय सत्यार्थ प्रकाश की कीमत ढ़ाई आने थी अर्थात दस पैसे थी उसने सैकड़ों सत्यार्थ प्रकाश मंगाकर बांटे | उसने क‍ईं आर्यसमाजों की स्थापना कराई | महात्मा नारायण स्वामी उसकी लगन व श्रद्धा देखकर बहुत प्रभावित हुए |

आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य‌ : – सन् 1930 ई. में दीपावली पर ऋषि निर्वाणोत्सव, चावड़ी बाजार, दिल्ली आर्यसमाज में खूब धूमधाम से मनाया गया | वहीं “आर्य नेताओं को राजनीति में आना चाहिये कि नहीं” इस विषय पर विचार विनिमय हुआ | कुछ महानुभावों का मत था कि आर्यसमाज को कंग्रेस के साथ मिलकर काम करना चाहिए | दूसरों का मत था कि आर्य समाज को राजनीति से पृथक रहना चाहिये |
उत्सव के प्रधान की हैसियत से महात्मा नारायण स्वामी जी ने आर्यसमाज की स्थिती के विषय में स्पष्ट दिशा निर्देश दिये |
“आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य” जैसा कि उसके नियमों में वर्णित है, संसार की शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक उन्नति करना है | इन तीनों में उन्नत होने के पश्चात मनुष्य उच्चकोटि का बन जाता है | अगर दूसरे शब्दों में कहा जाय तो आर्यसमाज का कार्य समस्त मनुष्यों को उन्नत बनाने का है अर्थात् आर्यसमाज को राजनीति में नहीं पड़ना चाहिये | इतने उच्च विचार और उद्देष्य रखते हुए, किस प्रकार आर्य समाज किसी देश विशेष व समुदाय में सिर न झुका कर अपने आपको समाविष्ट कर सकता है | आर्य समाज के नियमों पर चल कर शुद्ध पवित्र हृदय होने पर, आर्य समाज मनुष्य को पूरी स्वतन्त्रता देता है कि वह अपनी इच्छा और पुरुषार्थ के अनुसार कार्य करे | आर्यसमाज उनके किसी कार्य में बाधा नहीं डालता | वह चाहे राजनीति हो या धर्मप्रचार | कांग्रेस ने क्रान्तिकारियों के लिए अपने द्वार बन्द कर रखे हैं | हम उनका भी स्वागत करते हैं | वे जब चाहे आएं और आत्मा को शान्त एवं दृढ़ बनाने का प्रयत्न करें” |
उस समय देश के स्वतन्त्रता-संग्राम का नेतृत्व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथ में था | बहुत से आर्य नेता कांग्रेस के साथ मिलकर स्वतन्त्रता की लड़ाई में बराबर लडते रहे और बलिदान भी हुए | पर यह भी सत्य है कि आर्य समाज राजनीति से अलग रहा |
महात्मा नारायण स्वामी एवं अन्तरंग सभा का यह निर्णय समयोपयोगी एवं सही था |
महात्मा जी निरन्तर देश भर में आर्यसमाज के प्रचार व प्रसार कर्ते यात्राएं करते रहे | जहां भी आवश्यक्ता होती स्वास्थ्य का विचार किये बिना सेवा हेतु जा पहुँचते | बीच बीच में अस्वस्थता, विश्राम करने को बाधित करती थी | अगर कहा जाए तो कर्मठता का दूसरा नाम “नारायण स्वामी” था |

बिहार में भूकम्प : – 15 फरवरी सन् 1934 ई. को बिहार में भयंकर भूकंप आया | इस भूकंप में बिहार के अनेक नगर नष्ट हो गए | हजारों की जानें गई व करोड़ों की सम्पत्ति नष्ट हो ग‍ई | उस समय महात्मा जी बरेली में बहुत बिमार थे | जाकर सेवा करने की बहुत इच्छा होने पर भी, अच्छा होने तक उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी | लगभग एक महीने के बाद डाक्टर की आज्ञा लेकर, आपने बिहार के लिए प्रस्थान किया | वहां के हालात देखकर महात्मा जी को अतीव कष्ट हुआ, वहाँ की आर्यसमाज द्वारा किये गये राहत कार्यों को देखकर संतोष भी हुआ | स्थान स्थान पर कैम्प लगे थे व भोजन, दवाईयों की व्यवस्था की जा रही थी | रहने के लिए घरों का निर्माण किया गया था, शुद्ध पानी कि व्यवस्था की ग‍ई व अनाथ बच्चों के लिए अनाथालय खोले गये थे |
महात्मा नारायण स्वामी ने वहां पन्द्रह दिन रहकर सब व्यवस्था देखी और संतोष अनुभव किया कि आर्यसमाजी भी इसप्रकार निष्ठा से सेवा व्यवस्था सुचारु रूप से कर सकते हैं |
उन्हीं दिनों महात्मा गांधी भी बिहार आए हुए थे | जगह-जगह पर उनकी सभाएं हो रही थीं | अपने भाषण में वे कहा करते थे कि यह भूकंप बिहार वासियों के कर्मों का फल है अर्थात् सवर्णों द्वारा अछूतों पर किए गए अत्याचारों का फल” |
नारायण स्वामी जी को महात्मा गांधी का यह कथन न्याय, तर्क और शास्त्रों के विरुद्ध लगा | उनकी सम्मति में तीन प्रकार के दुख (आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक) में से केवल आध्यात्मिक दुःख मनुष्योंके कर्मों का फल हुआ करते हैं, बाकी दो प्राकृतिक नियमों की गतिविधियों से हुआ करते हैं | उनमें मनुष्य के कर्म का कोई भी हिस्सा नहीं होता | अगर यह उच्चजाति के लोगो‍ं के अत्याचार का फल था, तो नीची जाति वालों को यह कष्ट क्यों झेलने पड़े | बल्कि नीची गरीब जातियों को ऊंची जातियों की अपेक्षा अधिक ही कष्ट सहने पड़े | उसके बाद महात्मा नारायण स्वामी ने महात्मा गांधी के इस कथन का कि “यह भूकंप बिहार की जनता का कर्मफल है”, अपने भाषणों में जमकर खंडन किया और इसे अन्धविश्वास से प्रेरित बताया |
महात्मा जी के इस कथन को बंगाल एवं बिहार के क‍ई समाचार पत्रों नें विस्तार से छापा | उनके इन विचारों की प्रतिक्रिया अच्छी रही |

अल्मोड़ा में आर्यसमाज की स्थापना व विस्तार‌ : – 20 म‍ई 1920 में रामगढ़ तल्ला में नारायण आश्रम की नींव रखी ग‍ई थी | उसके बाद प्रतिवर्ष कुछ महीनों के लिए वे नारायण आश्रम अवश्य जाते और अपना समय स्वाध्याय, पठन, पाठन, लेखन व योगाभ्यास में बिताते थे | साथ ही पहाड़ के छोटे-बड़े शहर, गावों में जाकर लोगों को समझाने का कार्य भी करते | स्थान स्थान पर निमन्त्रित किये जाते रहे | इन्हीं दिनों आपने अलमोड़ा में आर्य समाज की स्थापना की | अन्य क‍ई स्थानों पर साप्ताहिक सत्संगों द्वारा आर्यसमाज का प्रचार किया करते | उन गावों में उन्होंने सामाजिक कुरीतियां उखाड़ फैंकने का प्रयत्न किया और विधवा विवाह स्वयं कराये 
नारायण आश्रम में वे जब रहने जाते तो गांव के बच्छों को पढ़ाया भी करते | सब श्रेणियों के, विविध विषयों के विद्यार्थी अपनी जिज्ञासा शान्त करने करने हेतु उनके पास आया करते | प्रारम्भ से ही आपकी शिक्षा के प्रति रुचि रही | आपने क‍ई ब्रह्मचारियों की अर्थिक सहायता भी की | उनके आवास व भोजन की व्यवस्था भी की |

युवकों पर प्रभाव‌ – एक बार वे फैजाबाद आर्यसमाज गये | वहां आपके सामने एक समस्या रखी ग‍ई | वहां के आर्यजन उसका समाधान नहीं कर पा रहे थे | समस्या यह थी कि एक साधारन हिन्दू परिवार का लड़का रामचन्द्र, आजमगढ़ मिशन स्कूल में पढ़ रहा था | विद्यार्थी मेधावी था | वहीं के प्रिंसिपल पादरी जे. एल. एलन ने उसे ऐसा समझाया कि वह ईसाई धर्म स्वीकार करने को तत्पर हो गया | उसके पिता उसे आर्यसमाज ले आए | रामचन्द्र के मन में जो शंकाएं थी वह उनका उत्तर चाहता था | पर वहां कोई उसकी शंकाओं का समुचित समाधान न कर सका | महात्मा जी ने देखा कि लड़के के दिमाग में हिन्दू धर्म के लिए विष घोला गया है | उसके पिता से आज्ञा लेकर वे उसे आजमगढ़ से फैजाबाद ले आए |
पादरी को रामचन्द्र के ईसाई होने पर इतना विश्वास था कि उन्होंने घोषणा कर दी कि अगर कोई रामचन्द्र का विश्वास इसाई धर्म से उठा देगा तो वे मिशन का काम छोड़ देंगे |

महात्मा नारायण स्वामी रामचन्द्र को अपने साथ गुरुकुल वृन्दावन ले आए | वहां आकर उन्होंने उसे दोनों धर्मों के बारे में बताया व अन्तर समझाया | वैदिक धर्म की विशेषताएं ह्रदयांकित करवा दी | वह ईसाई धर्म को भूल गया | जब पादरी साहब को यह पता चला तो महात्मा जी से आज्ञा लेकर रामचन्द्र से मिलने आए और समझा-बुझाकर साथ ले जाना चाहा | पर रामचन्द्र पर अब वैदिक धर्म का रंग इतना चढ़ चुका था कि उसने जाने से साफ इन्कार कर दिया | महात्मा जी ने उसे शिक्षा के लिए मुल्तान भेज दिया | वहां उसने शास्त्री तक की पढ़ाई की | उसका सारा व्यय महात्मा जी वहन करते रहे |

ऐसे ही एक विद्यार्थी मनुदत्त महात्मा जी के पास आया | उसकी आयु पन्द्रह..सोलह वर्ष रही होगी | उसके पिता उसका विवाह उन्नीस वर्ष की कन्या से कर रहे थे, वह अभी पढ़ना चाहता था | महात्मा जी ने पहले तो उसके पिता को बहुत समझाना चाहा, जब वे राजी नहीं हुए तो उन्होंने उस लड़के को छात्रवृत्ति देकर लाहोर भेज दिया | वहीं से उसने शास्त्री परीक्षा पास की | घर लौटकर विवाह किया |

सामाजिक सुधार : -‍ महर्षि दयानन्द ने देश में होने वाली सामाजिक कुरीतियों, अन्धविश्वासों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया था | उनके आने से पहले अन्धविश्वासों नें हमारी पुरातन संसकृति को भस्मप्राय कर दिया था | महर्षि के अथक प्रयत्न से फिर से प्रकाश के प्रभाव दीखने लगे | वेदों की ज्योति तो प्रज्वलित कर दी पर उनको इतना समय न मिला कि उसे दिग्दिगन्त तक फैला सकें | यह कार्य उन्होंने आर्य समाज पर छोड़ दिया | आर्यसमाज उनका उत्त‌राधिकारी था | आर्यजनों ने यथाशक्ति वह प्रकाश फैलाने का प्रयत्न किया | म. नारायण स्वामी भी ऋषि के उन शिष्यों में से थे जिन्होंने आजन्म धर्म, देश व जाति की सेवा करते हुए वेद ज्योति को प्रज्वलित रखा | सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रधान होने के कारण वैसे भी आप पर बहुत जिम्मेदारियां थीं | आर्यसमाजों की आपसी गुटबाजी या बाहरी झगड़ों को सद्भावनापूर्वक निपटाना भी आपके कार्यक्षेत्र में आता था | कइं बार तो अन्न त्याग की धमकी भी देनी पड़ी | ऐसा ही एक झगड़ा आर्य समाज चावड़ी बाजार, दिल्ली के स्कूल (दयानन्द नैशनल स्कूल) के प्रधानाध्यापक एवं कमेटी में हो गया | झगड़ा बढ़ता देखकर ‌महात्मा नारायण स्वामी को मध्यस्थता के लिए बुलाया गया | आपने अत्यन्त चतुरतापूर्वक दोनों का समझौता करा सामंजस्य स्थापित किया | इसी प्रकार भारतीय शुद्धि सभा के सदस्यों में आपसी विरोध दूर किया | परन्तु यह सभा अधिक दिन न चल सकी |

सन् 1933 ई. में अलमोड़ा में आर्यसमज के साथ आर्य कन्या पाठशाला का शुभारम्भ किया | वहां ही बाद में एक अनाथालय की भी स्थापना की गई | डा. केदारनाथ जी को वानप्रस्थ की दीक्षा देकर पाठशाला व अनाथालय व्यवस्था उनके अधीन कर दी ग‍ई |
ग्वालियर यात्रा में आपने सात..आठ युवकों का यज्ञोपवीत कराया | बाद में सर्वधर्म सम्मेलन का भी आयोजन किया गया | इसमें ईसाई, पादरी व मुसलमान मौलवी भी शामिल हुए |उन्होंनें हिन्दुओं के जातिवाद की निंदा की | बाद में ‌महात्मा नारायण स्वामी का अध्यक्षीय भाषण हुआ | उन्होंने कहा कि हिदुओं के जातिवाद से कहीं भयंकर पश्चिम का जाति वाद है | वहां अंग्रेज, फ्रांसिसी, जर्मन व डच जातियां हैं | जिनमें सदा वैमनस्य रहत है व युद्ध होते रहते हैं | ये जातियां आपस में घृणा करती हैं व एक दूसरे को नीचा दिखाने को तत्पर रहती हैं | हिन्दुओं की जातियां भी परस्पर वैमनस्य पैदा करती हैं | कोई नीची है कोई ऊंची | परन्तु राष्ट्रों का जातिवाद अत्यन्त भयंकर एवं विनाशकारी है | दोनों को ही दूर करके भातृभाव पैदा करना चाहिए | “वसुधैव कुटुम्बकम्” 
सन् 1936 ई. में आपने कन्या गुरुकुल की कार्यकारिणी सभा, गुरुकुल वृन्दावन के प्रधान पद से, तथा 1937 में सार्वदेशिक के प्रधान पद से इस्तीफा देकर अपने को स्वतन्त्र कर लिया | आप सार्वदेशिक सभा के लगातार चीदह वर्ष तक प्रधान रहे | आप निस्चिन्त होकर धर्म एवं जनता की सेवा में लग गये |

इसके बाद आप कुछ वर्ष प्रचार यात्राओं पर जाते रहे | सिन्ध में आप 10-12 दिन रहे | जिसमें कराची, कैमारी, हैदराबाद, सिन्ध, सक्खर, लड़काना मोहनजोदड़ो व शिकारपुर मुख्य थे |

हैदराबाद सत्याग्रह : – हैदराबाद भारत के दक्षिण में स्थित, निजाम के अधीन एक बड़ी रियासत थी | रियासत में हिन्दुओं की संख्या 75 प्रतिशत थी | राजा के मुसलमन होने से उन्हें तरह-तरह के अत्याचार सहने पड़ते | हैदराबाद में भी आर्यसमाज की स्थापना हो चुकी थी | वहां दबाव डालकर व सुविधाएं देकर हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का षड्यन्त्र चल रहा था | जो एक बार इसलाम धर्म स्वीकार करले, वह वापस हिन्दु नहीं बन सकता था | आर्यसमाज ने शुद्धि का कार्य आरम्भ किया | कट्टर मुसलमानों का गुस्सा भड़क उठा | क्योंकि शुद्धि का कार्य आर्यसमाज करता था | अतः आर्य समाज को ही निशाना बनाया गया | आर्यसमाज के सत्संगों के लिएसरकारी आज्ञा लेनी पड़ती थी | “सत्यार्थ प्रकाश” पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | पहले तो सरकार को पत्र लिखकर अपना कष्ट बताया गया और यह प्रतिबन्ध हटाने की मांग की ग‍ई | परन्तु सरकार पर कोई असर न पड़ा | मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों..दवा की | अब और भी सख्ती की जाने लगी |

हैदराबाद के आर्य नेताओं नें देहली आकर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा के सामने अपना कष्ट रखा | सभा का बृहत् अधिवेशन बुलाया गया | जिसमें शान्तिपूर्ण सत्याग्रह करने का प्रस्ताव 15 अक्टूबर सन् 1938 को पारित हो गया और इस बृहत् कार्य का गुरुभार महात्मा नारायण स्वामी को सौंपा गया, जिसे उन्होंनें सहर्ष स्वीकार कर लिया |

महात्मा जी अपने कुछ साथियों के साथ शोलापुर पहुंचे | शोलापुर में हैडक्वार्टर बनाया गया | रास्ते में बम्बई [मुम्ब‍ई] रुक कर वहां के लोगों से भी सहायता का वचन लेते आए | 29 अक्टूबर को स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी व आर्य रक्षा समिति के मन्त्री के साथ शोलापुर पहुंचे | स्टेशन पर स्वागत के बाद उन्हें एक किराए के मकान में ठहरा दिया गया | हिन्दुओं की बहुसंख्या होने पर भी लगभग सारी सरकारी नौकरियां (छोटी..बड़ी) मुसलमानों के लिए सुरक्षित थीं | योग्यता होनी भी आवश्यक नहीं थी | स्कूलों में मुसलमान मौलवी ही शिक्षक होते | वे पढ़ाते कम , धर्मप्रचार अधिक करते थे, व बच्चों का धर्म परिवर्त्तन करते | मन्दिरों, आर्यसमाजों पर “ओउम्” का झण्डा नहीं लगा सकते थे | हिन्दुओं को धार्मिक कृत्यों व नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था | 10 प्रतिशत् मुसलमानों के फन्दे में 86 प्रतिशत् हिन्दु बंधे हुए थे | कोई हिन्दू समाचार पत्र न तो प्रकाशित कर सकता था, न ही बाहर से मंगा सकता था | उन पर भी प्रतिबन्ध था | उधर जहां अंग्रेजी राज्य था वहां सब धार्मिक कृत्यों की व लिखने पढ़ने की स्वतन्त्रता थी | इसलिये हैदराबाद के आर्यों में असन्तोष पैदा हुआ और अपने अधिकार के लिये लड़ने का उत्साह भी |…महात्मा जी अपने कुछ साथियों के साथ शोलापुर पहुंचे | शोलापुर में हैडक्वार्टर बनाया गया | रास्ते में बम्बई [मुम्ब‍ई] रुक कर वहां के लोगों से भी सहायता का वचन लेते आए | 29 अक्टूबर को स्वामी स्वतन्त्रतानन्द जी व आर्य रक्षा समिति के मन्त्री के साथ शोलापुर पहुंचे | स्टेशन पर स्वागत के बाद उन्हें एक किराए के मकान में ठहरा दिया गया | हिन्दुओं की बहुसंख्या होने पर भी लगभग सारी सरकारी नौकरियां (छोटी..बड़ी) मुसलमानों के लिए सुरक्षित थीं | योग्यता होनी भी आवश्यक नहीं थी | स्कूलों में मुसलमान मौलवी ही शिक्षक होते | वे पढ़ाते कम , धर्मप्रचार अधिक करते थे, व बच्चों का धर्म परिवर्त्तन करते | मन्दिरों, आर्यसमाजों पर “ओउम्” का झण्डा नहीं लगा सकते थे | हिन्दुओं को धार्मिक कृत्यों व नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था | 10 प्रतिशत् मुसलमानों के फन्दे में 86 प्रतिशत् हिन्दु बंधे हुए थे | कोई हिन्दू समाचार पत्र न तो प्रकाशित कर सकता था, न ही बाहर से मंगा सकता था | उन पर भी प्रतिबन्ध था | उधर जहां अंग्रेजी राज्य था वहां सब धार्मिक कृत्यों की व लिखने पढ़ने की स्वतन्त्रता थी | इसलिये हैदराबाद के आर्यों में असन्तोष पैदा हुआ और अपने अधिकार के लिये लड़ने का उत्साह भी |

महात्मा नारायण स्वामी ने कुछ दिन रहकर स्थिति का जायजा लिया | उन्होंने देखा कि वहां के हिन्दू भी उन्हें मिलने से घबराते हैं | एक बार सबको स्थिति बतानी आवश्यक थी, सो आर्य महासम्मेलन बुलाने का निश्चय किया गया | इस सम्मेलन में सम्पूर्ण भारतवर्ष के आर्य प्रतिनिधि एकत्र हुए | इस सम्मेलन में सर्वसम्मति से “सत्याग्रह” करने का निश्चय हुआ | इस प्रकार आन्दोलन की पृष्ठ भूमि तैयार की गई |
color=”orange 500 सत्याग्रहियों ने उसी समय नाम लिखा दिये थे | सारे भारत से सत्याग्रहियों के जत्थे पहुँच रहे थे | 22,000 सत्याग्रहियों की सूचि तैयार हो ग‍ई | स्मरण रहे, इससे पहले हैदराबाद के आर्यों ने सत्याग्रह किया था और उस सत्याग्रह में 10-12 सत्याग्रही पुलिस की हिरासत में प्राण त्याग चुके थे | अतः जिन सत्याग्रहियों ने नाम लिखवाया, यही सोचकर कि अब प्राणों को भी न्योच्छावर करना पड़ा, तो करेंगे ||
साथ ही महात्मा नारायण स्वामी की गिरफ्तारी के बाद कौन नेतृत्व करेगा, यह श्रंखला भी तैयार की ग‍ई | इसके अतिरिक्त 51 हजार रुपये बैंक में जमा कर दिये गए कि धनाभाव से व्यवधान न पड़े |
31 जनवरी 1939 ई. को महात्मा नारायण स्वामी ने हेदराबाद शहर जाकर सत्याग्रह का श्री गणेश किया | पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया और कार में बैठाकर शोलापुर की सीमा पर उतार दिया |
6 फरवरी को आपने बीस स्वयं सेवकों के साथ गुलबर्गा जाकर सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तारी दी | अदालत की औपचारिकताएं पूरी की गईं और एक वर्ष की सजा सुना दी ग‍ई | पहले कुछ दिन महात्मा जी को रस्सी बंटने का काम दिया गया | पर पन्द्रह दिन बीतते-बीतते खाने पीने की विशेष व्यवस्था कर दी ग‍ई व लिखने पढ़ने की सुविधा दे दी ग‍ई | बाद में आपके रहने की व्यवस्था अलग बंगले में कर दी गई, जहां दो सत्याग्रही भोजन आदि बनाने व दो अन्य कामों के लिए दे दिये गए | आपके साथ स्वामी स्वतन्त्रतानन्द‌ जी व अन्य एक व्यक्ति और था |

सत्याग्रह जोर पकड़ता गया | सारे भारत से सत्याग्रहियों के जत्थे हैदराबाद पहुँचने लगे | महात्मा नारायण‌ स्वामी जी सत्याग्रह के अन्त तक गुलबर्गा जेल (बंगले) में ही रहे | सत्याग्र्ह 6 महीने चला | आर्य समाज के मूर्धन्य नेता हैदराबाद में जमा हो गए | निजामशाही कुछ झुकी और समझौते को तैयार हो ग‍ई | 8 अगस्त 1939 को उनकी आर्य नेताओं की शर्तें मान ली ग‍ईं |
महात्मा नारायण स्वामी अपने साथियों के साथ रिहा हुए | सब जगह सत्याग्रहियों का शानदार स्वागत हुआ | सारे देश के हिन्दुओं में हर्षोल्लास की लहर दौड़ ग‍ई |

हैदराबाद सत्याग्रह – एक संक्षिप्त अवलोकन : –
31 जनवरी को महात्मा नायण स्वामी को सीमा पर छोड़ दिया गया | जेल जाने वाले सत्याग्रहियों का पहला जत्था गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालययों के छात्रों का था | 15 विद्यार्थियों नें दो दलों में बंटकर 2-3 फरवरी को सिकन्दराबाद में नारे लगाते हुए गिरफ्तारी दी | इसके बाद कुंवर चांद करण शारदा, श्री खुशहाल चन्द जी, महाशय कृष्ण जी, राजगुरु धुरेन्द्र शास्त्री, श्री वेदव्रत वानप्रस्थी, प. ज्ञानेन्द्र सिद्धान्तभूषण, प. बुद्धदेव विद्यालंकार, आचार्य देवेन्द्रनाथ शास्त्री, श्री चिदानन्द जी, श्री विनायक राव विद्यालंकार ने कुछ कुछ दिनों के अन्तर पर सत्याग्रहियों का नेतृत्व करते हुए गिरफ्तारी दी | इस सत्याग्रह में 12,000 से अधिक आर्यवीरों ने गिरफ्तारी दी ||
24 आर्यवीरों ने जेल में अपने प्राण त्याग दिये | सत्याग्रह से पहले 15 आर्य वीर धर्मान्ध क्रूरता के शिकार होकर अपने प्राण गंवा चुके थे |
इस सत्याग्रह में आर्यसमाज का लगभग 20 लाख रुपया खर्च हुआ | 8 मार्च 1939 को अंग्रेज सरकार के इशारे पर निजाम नें सब शर्तें मान लीं |
जेल से छूटे हुए सत्याग्रहियों का झांसी में सामुहिक अभिनन्दन हुआ | हर रेलवे स्टेशन पर लोगों की भीड़ उनके स्वागत को उमड़ रही थी | देहली में क्वींस गार्डन में एक विशाल सभा का आयोजन किया गया | हजारों नर नारियों ने विजयी होकर आए सत्याग्रहियों का स्वागत किया और बलिदान देने वालों को श्रद्धा सुमन अर्पित किये |
इन स्वागत समारोहों में शामिल होते हुए महात्मा जी अन्त में 28 अगस्त को आर्य वानप्रस्थ आश्रम ज्वालापुर पहुँचे | जहां पंचपुरी की सभी संस्थाओं (गुरुकुल कांगड़ी, महाविद्यालय ज्वालापुर, आर्य वानप्रस्थ आश्रम आदि सभी संस्थाओं) की ओर से आपका स्वागत किया गया | ज्वालापुर में दो दिन रुक कर आप सीधे अपने हैडक्वार्टर रामगढ़ तल्ला के नारायण आश्रम पहुँचे | 15 सितम्बर 1939 को रामगढ़ वासियों की इच्छा, प्रेरणा, सहयोग एवं सहायता से “नारायण स्वामी स्कूल” की आधार शिला रखी ग‍ई | तत्कालीन मुख्यमन्त्री गोविन्द बल्लभ पंत ने यथा-साध्य सहायता देने का वचन दिया | सन् 1943 में स्कूल हाईस्कूल बन गया |
वे कुछ दिनों के लिए पहाड़ पर भी जाते थे | उन दिनों वहां के निवासियों के लिए कार्य करते रहते थे | पहाड़ पर उस समय अन्धविश्वास से उत्पन्न कुप्रथाएं प्रचलित थीं ऊंची और नीची जाती का भेद था | बालविवाह का आपने विरोध किया और विधवा विवाह का प्रचलन आरम्भ किया ||
गढ़वाल में मुख्यतः दो जातियां हैं बिष्ट उच्च, एवं शिल्पकार (हरिजन) | उच्च जातियां अपने धन व अधिकारों के कारण नीची जातियों पर अत्याचार करती थीं | नीची जाति का जो भी व्यक्ति आर्य बनता उसे आर्य मान लिया जाता | एक प्रथा के अनुसार शिल्पकार के वर-वधु को बिष्टों के मन्दिर व देवस्थानों के सामने डोली से उतर कर पैदल चलना पड्ता था | आर्य बने शिल्पकारों का कहना था कि जब हम मूर्ति पूजा को ही नहीं मानते तो देवालयों के सामने क्यों उतरें ?
महात्मा नारायण स्वामी के नेतृत्व में इस प्रथा के विरुद्ध आन्दोलन किया गया और सफल भी हुए | इलाहाबाद कोर्ट ने एक प्रसिद्ध फैंसले में आर्यों की डोला-पालकी निकालने के अधिकार को स्वीकार कर लिया ||
इसी प्रकार काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर महेश प्रसाद जी की बेटी को विश्वविद्यालय के वेद विभाग में दाखिला देने के लिए भी आपने बहुत प्रयत्न किया और कुमारी कल्याणी को दाखिला मिल जाने से अन्य इच्छुका कन्याओं के लिए भी रास्ता खुल गया |

सिन्ध सत्याग्रह :-
सन् 1944 ई. में सिन्ध प्रान्त की मुसलिम सरकार ने “सत्यार्थ प्रकाश” के 14 वें सम्मुलास को प्रतिबन्धित करने के नाम से पूरे सत्यार्थ प्रकाश पर प्रतिबन्ध लगा दिया | उसका छापना और रखना भी प्रतिबन्धित हो गया | उनकी दृष्टि में 11 से 14वें सम्मुलासों में विभिन्न धर्मों की अनर्गल झूठी बातों को दिखाया गया है अर्थात् आलोचनात्मक समीक्षा है |
इस अन्याय का विरोध केवल आर्यों ने ही नहीं, अन्य धर्मावलम्बियों ने भी किया | सार्वदेशिक सभा की अन्तरंग सभा बुलाई गैइ और शान्ति पूर्वक सत्याग्रह द्वारा अपना अधिकार प्राप्त करने का निश्चय किया गया | परन्तु निषेध आज्ञा केवल दो वर्ष के लिए थी और कुछ समय बीत भी चुका था | सो प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया गया | दो वर्ष बाद जब फिर से इस पैक्ट की अवधि बढ़ा दी गई तो आर्यों का रोष और क्षोभ बढ़ना स्वभाविक था |
सार्वदेशिक सभा की अंतरंग सभा ने सत्याग्रह करने का निश्चय किया | आर्यजनों में भी अब आत्मविश्वास जाग चुका था | हैदराबाद सत्याग्रह का सफलतापूर्वक नेतृत्व करने वाले महात्मा नारायण स्वामी जी से इस सत्याग्रह का नेतृत्व सम्हालने की प्रार्थना की गैइ | महात्मा जी ने स्वीकार कर लिया | उस समय म. नारायण स्वामी जी की आयु 83 वर्ष की थी और अनेकों बिमारियों ने उन्हें घेरे रक्खा था | किन्तु यह गुरुभार आपने सहर्ष स्वीकार कर लिया |
3 नवम्बर 1946 की हैदराबाद सत्याग्रह के कुछ महारथियों को लेकर आपने कराची के लिए प्रस्थान किया | राजगुरु धुरेद्र् शास्त्री, महात्मा आनन्द स्वामी,कुंवर चांदकरण शारदा, वेदव्रत जी शास्त्री, लक्ष्मीदत्त जी दीक्षित आदि आर्य विद्वान उनके साथ थे |
सत्याग्रह का बिगुल बजते ही आर्यों में उत्साह और चेतना की लहर दौड़ गई | सत्याग्रहियों की लिस्ट बनने लगी |
सर्व प्रथम तो आपने सिध के मुख्यमंत्री को इस विषय में पत्र लिखा | यह भी लिखा कि अगर सात दिन के अन्दर हमारी शर्तें नहीं मानी गईं तो सत्याग्रह का रास्ता पकड़ा जायगा |
सत्याग्रह की आवश्यक्ता नहीं पड़ी और सत्यार्थ प्रकाश पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया | कथा प्रवचन की छूट मिल गई |
20 जनवरी 1947 को महात्मा जी वहां से वापस आ गए | उस समय शारीरिक व मानसिक परिश्रम से उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो चुका था | उन्होंने आर्य समाज के अधिकारों के युद्ध में नेतृत्व सम्हाला और असह्य कष्टों को सहन किया | आयु भी निरन्तर बढ़ ही रही थी | शरीर भी शिथिल हो रहा था | हैदराबाद सत्याग्रह के बाद ही डाक्टरों ने आपको पूर्ण विश्राम करने की सलाह दी थी | पर वह महारथी भीष्म की तरह, कर्त्तव्य पालन में जीवन के अन्त तक संघर्ष करने में विश्वास रखते थे |
सिन्ध सत्याग्रह उनके जीवन रूपी यज्ञ की अन्तिम आहुति सिद्ध हुई | डाक्टरों ने पेट का आपरेशन कराने का परामर्श दिया | महात्मा कृष्ण जी वान्य प्रियजन उन्हें लाहोर ले गए और कुशल डाक्टर से आप्रेशन कराया | पेट खोलने पर पता चला कि पेट का कैंसर फैल चुका है | उन्होंने उसी तरह पेट को सिल दिया |
अपने शरीर की जर्जरता को अनुभव कर महात्मा जी ने जीने की इच्छा ही त्याग दी “अब इस निकम्मे शरीर को लेकर रहने से क्या लाभ ? “
15 अक्टूबर 1947 में उनका देहान्त हो गया | आर्य समाज का एक देदीप्यमान नक्षत्र अस्त हो गया | आर्यजनों को पथ प्रदर्शन करने वाली ज्योति, उस परम ज्योति में समाहित हो गई |
उपसंहार – महात्मा नारायण स्वामी ने एक अत्यन्त साधारण परिवार में जन्म लिया था | शिक्षा भी साधारन हुई | पारिवारिअक जीवन भी आधा अधूरा रहा पर वे आसाधारण थे | उन्होंने अपनी लगन, आत्मविश्वास, चरित्र बल द्वारा सब बाधाएं लांघ लीं और और आर्य जगत् में ही नहीं, देश भर में अपने लिए एक गौरवपूर्ण, सम्माननीय स्थान बनाया | उनके विचार उच्च और पवित्र थे |
सदा सत्य पर दृड़ रहना, उनका स्वभाव था | सत्य से उत्पन्न होने वाला तेज उन्हें सदा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहा | उनकीत्याग, सादगी और कर्त्तव्यनिष्ठा, ने उनको सफलता के ऊंचे शिखर पर पहुंचने में सहायता दी |
सामने बाधा आने पर वे चट्टान की भांति दृढ़ता से उसका सामना करते | असत्य के लिए कठोर और दीन दुखियों के दुख से द्रवित हो जाते | उनका जीवन त्याग तपस्या का उद्धाहरण था |
वे प्रबन्धन में प्रवीण थे | मथुरा व अजमेर शताब्दियों व हैदराबाद व सिन्ध के सत्याग्रह के सुप्रबन्धन, आपकी प्रबन्ध क्षमता के जीवन्त उद्धाहरण थे, कारण यह था कि वे स्वयं भी उन नियमों का पालन करते थे, जिनकी व्याख्या करते थे |
वे एक सिद्धहस्त लेखक थे | जीवन के यौवनकाल में उन्होंने संस्काृत पढ़नी आरम्भ की और उसमें प्रवीणता प्राप्त की | वेद और उपनिषदों का अध्ययन किया | रामगढ़ तल्ला में वर्ष में तीन चार महीने वे स्वाध्याय व योगाभ्यास में बिताते थे | अनेक वैदिक ग्रन्थों का मनन करने के न्बाद आपने निम्नलिखित ग्रन्थों का लेखन किया |
1. कर्त्तव्य दर्पण |
2. विद्यार्थी जीवन रहस्य |
3. मृत्यु और परलोक |
4. प्राणायाम विधि |
5. वैदिक संध्या रहस्य |
6. योग दर्पण की टीका (योगिक क्रियाओं का पहले स्वयं अनुष्ठान किया) |
7. आत्म दर्श्स्न |
8. वेद व प्रजातन्त्रीय राज्य व्यवस्था |
9. ऋषि दयानन्द और आर्य समाज |
10. वैदिक साम्यवाद |
11. वैदिक धर्म को क्यों ग्रहण करें ?
12. ईसा का जीवन चरित्र |
13. शूद्रवर्ण के कर्त्तव्य और अधिकार |
14. संन्यासी कर्त्तव्य दर्पण |
निम्नलिखित उपनिषदों के भाष्य लिखे : –
1. ईशोपनिषद् 2. केनोपनिषद् 3. कठोपनिषद् 4. प्रश्नोपनिषद् 5. मुण्डकोपनिषद् 6. मांडूक्योपनिषद् 7. तैतरीय उपनिषद् 8. एतरेय उपनिषद् 9. छान्दोग्योपनिषद्
निम्न पैम्फ्लेट भी प्रकाशित किए : –
1. वर्ण व्यवस्था सम्बन्धी आक्षेपों का उत्तर |
2. महात्मा जग्दम्बा प्रसाद का ट्रैक्ट “मैंने इसलाम क्यों क्यों ग्रहण किया” का उत्तर |
3. ला. जगन्नाथ द्वारा वेदभाष्य पर लगाए गए आक्षेपों का उत्तर |
निम्न पुस्तकों की भूमिका लिखी : –
1. निबन्ध संग्रह (सार्वदेशिक सभा द्वारा प्रकाशित) |
2. दयानन्द सिद्धान्त भाष्य |
3. यम पितृ परिचय |
4. प. प्रियरत्न जी के दो ग्रन्थ |
5. प्रिंसिपल राजेन्द्र कृष्ण कुमार मोगा के ग्रन्थ की अंग्रेजी में भूमिका |
आज हम उनके द्वारा संस्थापित हुए “आर्य वानप्रस्थ आश्रम” की हीरक जयन्ती मना रहे हैं | अर्थात् सन् 1928 में आश्रम की नींव पड़ी थी | 75 वर्षों में यह अब पूर्ण वटवृक्ष की भांति पल्लवित, पुष्पित हो रहा है | वानप्रस्थियों को अनेकों सुविधाएं उपलब्ध हैं | नियम से यज्ञ-प्रवचन योगाभयास भी हो रहे हैं | जैसा कि सदा होता है कि महान आत्मा के त्याग-तपस्या के उद्धाहरण हमारे लिए शून्य हो जाते हैं | हम महान व्यक्ति को मानते हैं पर उस व्यक्ति के आदर्शों को नहीं मानते | यह संसार का विचित्र नियम है |
उनकी जीवन..गाथा पढ़कर हम उनके पद-चिह्नों पर चलने का प्रयत्न करें | तभी हीरक जयन्ती मनाना सफल होगा | घोर अविद्या अन्धकार में भटकी हुई, दारुण दुःख से कराहती मानवता, उदीयमान सूर्य के उज्जवल प्रकाश में सुपथ पाकर, प्रसन्नता से हर्षित, उत्साही होकर लक्ष्य तक पहुंचने की आशा में फूली नहीं समाती | ज्ञान रूपी सूर्य को घेरे हुए अविद्या रूपी वृत्र (अन्धकार) का नाश करने का नारायण स्वामी का निर्देश, हमें कर्मठ बनाए रखे, यही परमपिता से “नम्र प्रार्थना है” |

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